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________________ 1 ¦ ¡ : 5 5 6 6 7 7 8 10 11 11 1 2 2 11 121 13 13 14 14 15 15 15 16 16 16 2 I 2 2 1 2 2 2 1 2 2 1 2 1 2 1 2 1 1 1 2 2 2 2 तत्सर्वं गलत: सोऽपि (सं. प्रति भी) देकानेकोऽपि स्वरूपत्वाद (सं. प्रति भी) स्वभावत्वाद ( शेष सभी) स वक्तव्यः नवक्तव्य: (भा. प्रति ज्ञा प्रति, व. प्रति) नैव (व. प्रति ) स मूर्ति (ज्ञा. प्रति) कारणं (व. प्रति ) नापि समूर्ति कर्मणां चारित्रमुपाया सौस्थित्य स्मृतम् (सं. प्रति भी) यथावद्वस्तु निर्नीतिः व्यवसायात्मा (सं. प्रति भी ) पर्याधि माध्यस्थं भावनादा अथवा मतम् यदेतन् (सं. प्रति भी ) तद्बाह्यं कालादिस्तपश्च दौस्थ्ये आत्मनो भावयेत्तत्त्वं ततः सर्वगतः * चार्य (शेष सभी) देकोऽनैकोऽपि (आ. प्रति) XVI चारित्रमुपाय सास्तिक्य ( आ. प्रति) मतम् यथावद्धस्तु (ज्ञा. प्रति ) निर्णीतिः (भा. प्रति ज्ञा. प्रति, व प्रति ) व्यवसायात्म Xx > X X संस्थित्य ( शेष सभी प्रतियों में ) X X X चारित्रे (व प्रति ) माध्यस्थ्य (भा. प्रति, ज्ञा. प्रति व. प्रति) भावनादाद (भा. प्रति ) अथवाऽपरम् (आ. प्रति झा प्रति) (भा तदेतन् (शेष सभी में) मदबाह्य (भा. प्रति ) कालादि तपश्च* दौस्थ्ये (भा. प्रति ज्ञा. प्रति, व प्रति ) आत्मानं भावयेन्नित्यं X X देकोऽनेकोऽपि (शेष सभी ) X X X X X अथवा परम् प्रति व प्रति) x X X X X x x
SR No.090485
Book TitleSwaroopsambhodhan Panchvinshati
Original Sutra AuthorBhattalankardev
AuthorSudip Jain
PublisherSudip Jain
Publication Year1995
Total Pages153
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Metaphysics
File Size3 MB
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