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________________ २२ सूक्तिमुक्तावली प्रवहं संसारसमुद्रतारणे प्रवहणसमानो गुरु स्तं गुरु विनान्यः कश्चिनास्ति । यो गुरुः कुत्रोधं कुत्सितज्ञानं मिध्यात्वं विदलयति । पुनर्यो गुरु रागमार्थ सिद्धान्तानां अर्थं योधयति ज्ञापयति । पुनर्यो गुरुः पुण्यपापे पुण्यं च पापं च पुण्यपापं ते धर्माधम द्वे अपि व्यनक्ति प्रकटयति । इवं पुण्यं इदं पापमिति । कथंभूते पुण्यपापे सुगतिकुगतिमार्गी सुगतिश्च कुगतिश्च सुगतिकुगतो नयो मार्गी पुण्यं देवनरादिसुगतिमार्गः पापं नरकतिक रूप कुगतिमार्गः । पुनर्यो गुरुः कृत्याकृस्यभेदं अवगमयति कर्तुं योग्यं कृत्यमयोग्यं अकृत्यं कृत्यं च अकृत्यं च कृत्याकृत्येतयोर्भेदो बिवेको विचारस्तं ज्ञापयति भो भव्यमाखिन् । इति ज्ञात्वा मनसि विषेकमानीय संसारसमुद्रतारणाय प्रवद्दण्समान: श्रीगुरोः सेवा कार्या । गुरोः सेवां कुर्वतां च सतां यत्पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्यप्रभावादुत्तरोत्तर मांगलिक्यमाला विस्तरन्तु || १४ || अर्थ - जो मिथ्याज्ञान को दूर करते हैं, आगम-सत् सिद्धांत के अर्थ का भले प्रकार प्रतिपादन करते हैं ( ज्ञान कराते हैं ) सुगति कुगति के कारण पुण्य पाप को प्रगट करते हैं, कर्तव्य कर्तव्य के भेद का ज्ञान कराते हैं वे ही गुरु संसार समुद्र से पार होने के लिये जहाज के समान हैं अन्य कोई भी पार करने में समर्थ नहीं है ऐसे ही दिगम्बर वीतराग साधु स्तुति और सेवा करने योग्य हैं अन्य भेषी स्तुति सेवा करने योग्य नहीं हैं। पुनर्गुरुसेवायाः फलमाह - शिखरिपोछन्दः पिता माता भ्राता प्रियसहचरी सूनुनिवहः सुहुत्स्वामी माद्यत्करिमटरथाश्वः परिकरः । €
SR No.090482
Book TitleSuktimuktavali
Original Sutra AuthorSomprabhacharya
AuthorAjitsagarsuri
PublisherShanti Vir Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages155
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size2 MB
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