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________________ सु०प्र० श्रीमजिनेन्द्रबिम्बस्य महास्नपनपूजनैः । श्रीशासनस्य माहात्म्यं कथं स्याद्विरमयावहम् ॥३१॥ तदर्थ हि महामक्त्यै काग्रेनात्र सुचिन्तनम् । एवमेव जिनाज्ञायाः प्रभावस्यविचिन्तनम् ॥३६॥ तदाझाविचयं ध्यान जिनाज्ञावर्द्ध परम् । भूतज्ञानं महादिव्यं त्रैलोक्यज्ञापकं शुभम् ॥३७बणैः पदावभिन्न हि जिनन्द्र: कथितं परम् । श्रवधानस्य माहात्म्य चिन्तन मनन तथा ||२८|| रोचनं स्पर्शनं चैव धर्म्यध्यानं तदुच्यते । श्रीमन्जिनेन्द्र देवेन शासनं प्रतिपादितम् ॥३॥ रत्नत्रयात्मक शुद्ध महद्भिरवधारितम् । तद्धि प्रतिष्ठितं स्वेषु चात्मकल्याणहेतवे ||४|| शिवप्रानिश्चतेनैव तस्माच्य स्करं मतम् । या चाज्ञा शासनस्यात्र जिनाज्ञा सेय कथ्यते ॥४१॥ मत्वेति शासनाज्ञायाश्चिन्तन मननं तथा । एकाप्रेन सुदृकशुद्धया तदानाविचयं विदुः ||४२।। कथं पात्र मुगृह्णीयुरिमे जीवाः सुदर्शनम् । प्राजाश्रद्धानपूर्वं हि भवाब्धे. स्तारकं परम् ॥४शा एकाग्रेन तदर्थ हि चान्यचिन्तां विहाय च । चिन्तन मननं भक्त्या तदाज्ञाविचयं विदुः 45.24Xमरस कार्य करनेके लिये महाभक्तिपूर्वक एकाग्र मनसे बार बार चिन्तवन करना अथवा इसीतरहसे भगवान जिनेन्द्रदेव की आज्ञाका प्रभावचिन्तवन करना आज्ञाविचय नामका धर्मध्यान कहलाता है। यह धर्मध्यान भी भगवान की आज्ञाको बढ़ानेवाला है और सर्वोत्कृष्ट है। इस संसारमें भ्रतज्ञान भी महादिव्य ई, तीनों लोकों का ज्ञान उत्पन्न करानेवाला है, शुभ है. वर्ण वा पदोंसे अनेक प्रकारका है और भगवान जिनेन्द्रदेवका कहा हुआ है। ऐसे इस श्रुतज्ञानका माहात्म्य प्रकट करना, चिन्तवन करना, मनन करना, श्रद्धा करना आदि सब धर्मध्यान कहलाता है। भगवान जिनेन्द्रदेवने अपना शासन स्त्रयात्मक बतलाया है। वह | शासन शुद्ध है, महापुरुष उसे धारण करते हैं ऐसे इस रत्नत्रयात्मक शासनको अपने आत्माका कल्याण करनेके लिये अपने आत्मामें धारण करना आज्ञाविचय धर्मध्यान कहलाता है ।।३५-४०॥ इस खत्रयरूप जिनशासनसे मोक्षकी प्राप्ति होती है, इसलिये यह शासन कल्याण करनेवाला है। इस शासनकी जो आज्ञा है, वही आज्ञा भगवान जिनेन्द्रदेवकी समझनी चाहिये । यही समझकर जिनशासनकी आशाका चिन्तन करना, मनन करना, सम्यग्दर्शनकी शुद्धतापूर्वक एकाग्र मनसे उसका ध्यान करना आज्ञाविचय नामका धर्मध्यान कहलाता है ॥४१-४२॥ ये संसारी जीव संसारसे पार करनेवाले और सर्वोत्कृष्ट सम्यग्दर्शनको भगवानकी | आज्ञाको श्रद्धानपूर्वक कर और किस प्रकार धारण करेंगे ? इसप्रकार अन्य सब चिन्तनोंको रोककर एकाप्रमनसे म समरस
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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