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________________ सिद्धान्तसारादिसंग्रहे हल सह कलहि केण सम्माणउ । जहिं जहिं जोवउ तह अप्पाणउ ॥ ३९॥ केषु समाधि करोमि कान् अर्चयामि । वैरमचरं कृत्वा कान् वचयामि ॥ . ........। यत्र यत्र पश्यागि तत्र भामा | दोहा । ताम कुतित्थ परिभमइ धत्तिम ताम करेड़ ] गुरुहु पसाए जाम ण वि देहह देव मुणेह ॥ ४० ॥ तावत्कुतीर्थेषु परिभ्रमति धूनत्वं तावत्करोति । गुरोः प्रसाद; यावन्न देहमेव देवं मनुते ॥ तित्यहि देवलि देउ ण वि इम सुइक्रेवलि वुत्तु । देहादेवालि देउ जिणु एहउ जाणि णिमंतु ।। ४ ।। तीर्थानि देवालयः देवो नापि एवं श्रुतकेवलिनोक्तम् । देहदेवालये देवो जिनः एवं जानीहि निर्धान्तम् ॥ देहादेवलि देउ जिणु जणु देवलिहि णिएइ । हासउ मह परि होइ इह सिद्धाभिक्ख भमेइ ।।४२ ॥ देहदेवालये देवो जिनः देवालये नास्ति । ? हास्यं मुखस्योपरि भवतीह सिद्धभिक्षा भ्रमति || ? मूढा देवलि देउ ण वि वि सलि लिप्पड चित्ति । देहादेवलि देउ जिणु सो बुज्झ समचित्ति ॥ ४३ ।। मूद ! देवालये देवो नापि नापि शिलायां लेपे चित्रे । देहदेवालये देवो जिनः तं बुध्यस्त्र समचेतसि ॥
SR No.090474
Book TitleSiddhantasaradisangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherM D Granthamala Samiti
Publication Year1979
Total Pages349
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size5 MB
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