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सिद्धांतसार दीपक हजार योजन है। सभी इन्द्रों का जघन्य अधिक्षेत्र २५ योजन प्रमाण है ।।१६७।। चारों दिशाओं में यह अवधि क्षेत्र अति अल्प कहा गया है, वैसे सभी भवनवासी देव अपने अवधिज्ञान से नीचे तीसरे नरक पर्यंत और ऊपर एक लाख योजनों से सम्मित मेरु पर्वत के शिखर पर्यंत जानते हैं ॥१६८-१६६।। अब चमरेन्द्र प्रादि इन्द्रों के परस्पर स्पर्धा स्थानों का कथन करते हैं :
सौधर्मेन्द्रण चित्ते चमरेन्द्र कुरते वृथा । सहाकिञ्चित्करामोष्या क्षेत्रसदभाववतनात् ॥१७०॥ तथेशानसुरेन्द्र ण सहेष्या निःफलां मुधा।
हृवि देवदेन्द्रोप करोति सपकारिणीम् ७१॥ अर्थ:-क्षेत्रगत निमित्त कारण से चमरेन्द्र अपने चित्त में सौधर्मेन्द्र से वृथा ही कुछ ईर्ष्या करता है ।। १७०। इसी प्रकार वैरोचन भी अपने हृदय में ऐशानेन्द्र से पापोत्पादक भौर निष्फल ईर्ष्या करता है ॥१७१॥ अब इस सिद्धान्तसार रूप श्रुत को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं :--
इत्येव करणानुयोगकथक सर्वशवाण्युदभव, धर्मध्याननिबन्धनं शुभनिर्षि व्यावरणनोत्थं परम, श्रीमभावनसंज्ञकामृतभुजां सिद्धान्तसारं श्रुतम् ।
धर्मध्यानशुमाप्तये मुनिविदो यत्नात पठन्स्यवहम् ।।१७२॥ अर्थ:-इस प्रकार जो करणानुयोग को कहने वाला है, सर्वज्ञ की वाणी से नि:सृत है, धमध्यान का हेतु है. शुभ का खजाना है तथा जिसमें भवनवासी देवों का महान वर्णन है ऐसे इस सिद्धान्तसार ग्रन्थ का मुनिजन धर्मध्यान रूपी शुभ परिणामों की प्राप्ति के लिये प्रयत्नपूर्वक निरन्तर अध्ययन करें॥१७२।। अधिकारान्त मङ्गल :--
ये तीर्थेशजिनालया मणिमया नागामरैः पूजिताः स्तुत्या भक्तिभरेण पुण्यनिषयो मेरोरधो भूतले, या दिव्या जिनमूतंयोऽति सुभगाश्चत्या मेषु स्थिता
स्तास्तानित्यसुखाप्तयेऽहमनिशं बन्दे स्तुवे मक्तितः ॥१७३।। इतिश्री सिद्धांतसारवीपकमहामन्थे भट्टारक श्रीसकलफोति विरचिते दविधभवनवासिदेव वर्णनोनामद्वादशोऽधिकारः ।।