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________________ ३६० ] सिद्धान्तसार दीपक अस्यवाभ्यन्तरे तेऽष्टादशयोजनसम्मिताः । सम्मन्छनभवा गर्भजा योजननवायताः ॥४०८।। योजनाष्टावशायामाः कालोदस्य नदीमुखे । सम्मन्छनजदेहास्ते गर्भजा नव योजनाः ॥४०६।। कालोदाभ्यन्तरे मत्स्याः शिद्योजनायताः। सन्मच्छनोभवाश्चान्ये योजनाष्टादशायताः ॥४१०॥ सहस्रयोजनायामा ये पञ्चशतविस्तृताः । ते सार्धद्विशतोत्सेधाः स्युश्चेति सर्वमत्स्यकाः ॥४११।। व्यास: स्यात् सर्वमत्स्यानां स्वाङ्गदीर्घाद्ध मेव च । व्यासाङ्गस्य यवध स उत्सेधोऽन्यत्र चेत्यपि ॥४१२॥ अर्थ:--किन्तु वे विकलेन्द्रिय जीव जम्बूद्वीप आदि अढाई द्वीप में, अर्धस्वयम्भूरमण द्वीप में और स्वयम्भूरमण समुद्र के बाह्य प्रदेश में होते हैं। लवणोदधि समुद्र में, कालोदधि समुद्र में और स्वयम्भूरमण समुद्र में अन्य जलचर जीव और कें र मन वाले मत्स्य रहते हैं । शेष असंख्यात समुद्रों में मत्स्य प्रादि जीव कभी भी नहीं पाये जाते। भोगभूमि क्षेत्रों में द्वीन्द्रिय प्रादि जीव पैदा नहीं होते १४०२-४०४३ स्वयम्भूरमण समुद्र के किनारे पर सम्मुच्र्छन जन्म और ५०० योजन आयाम वाले महामत्स्य पाये जाते हैं ।।४०५।इसी समुद्र के मध्य में सम्मूर्छन जन्म से उत्पन्न १००० योजन लम्बे मत्स्य रहते हैं, और गर्भन मत्स्य ५०० योजन लम्बाई वाले रहते हैं ॥४०६।। लवणसमुद्र के नदी मुख पर ह योजन लम्बे सम्मूच्र्छन जन्म वाले और ४३ योजन लम्बे गर्भजन्म बाले मत्स्य रहते हैं। ॥४०७।। इसी समुद्र के मध्य में १८ योजन लम्बे सम्मूद्धं न जन्म वाले और ६ योजन गर्भ जन्म वाले मत्स्म रहते हैं ॥४०८।। कालोदधि समुद्र के नदो मुख पर १८ योजन लम्बे सम्मूच्र्छन जन्म वाले और ह योजन लम्बे गर्भ जन्म वाले मत्स्य रहते हैं ।।४०६।। कालोदधि के मध्य में ३६ योजन लम्बे सम्मूच्र्छन जन्म वाले और १० योजन लम्बे गर्भ जन्म वाले मत्स्य रहते हैं ।।४१०।। स्वयम्भूरमण समुद्र के महामत्स्यों का शरीर १००० योजन लम्बा, ५०० योजन चौड़ा और २५० योजन ऊँचा है ।।४११।। अन्य शेष समुद्रों के मत्स्यों के अपने अपने शरीर को जितनी लम्बाई होती है, व्यास उससे प्राधा होता है, तथा व्यास के अधं भाग प्रमाण शरीर की ऊँचाई होती है ।।४१२।। ___ अब एकेन्द्रिय ( कमल ) और विकलेन्द्रिय जीवों के शरीर का पायाम मादि कहते हैं :-- सहस्रयोजनःर्घा योजनव्याससंयुताः । पद्माः सन्ति महाम्भोधौ द्विक्रोशाय : किलान्तिमे ।।४१३।।
SR No.090473
Book TitleSiddhantasara Dipak
Original Sutra AuthorBhattarak Sakalkirti
AuthorChetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages662
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size15 MB
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