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________________ खोह से आये 'भद्र' तथा 'सिंह' नाम से, इन पूज्य अर्हद् बलि आचार्य को मान्य थे। एवं तस्याईबले मुनिजनसङ्घप्रवर्तक स्यासन् । विनययजना मुनीन्द्राः पञ्चकुलाचारतोपास्याः ।।१०१॥ अन्वयार्थ- (एवं) इस प्रकार (तस्य) उन (मुनि संघ प्रवर्तकस्य) मुनि संघ के प्रवर्तक (अर्हबले) अर्हबलि का (विनययजना) विनय पूर्वक अपने आचार्य की पूजा करने वाले (मुनीन्द्राः) मुनीश्वर (पञ्चकुलावारतः) पाँच कुलों के आचार से (उपास्याः) उपासनीय (आसन) थे। अर्थ-इस प्रकार मुनि संघ के प्रवर्तक उन आचार्य अर्हद्बलि के विनयपूर्वक पूजा करने वाले मुनिकर इन पाँच कुलों के आकार से १. गुफाओं के निवास से आने वाले, २. अशोक वृक्षों के उद्यान से आने वाले, ३. पञ्चस्तूप्य निवास से आने वाले, ४. शाल्मली वृक्षों की खोह से आने वाले तथा ५. केसर वृक्षों की खोह से आने वाले- इस प्रकार पाँच समूहों के आचार से वे उपासनीय थे। तस्यानंतरमनगारपुङ्गवो माघनन्दिनामाऽभूत् । सोऽप्यनपूर्यदेशं प्रकाश्य समाधिना दियं यातः ॥१०२ ।। अन्वयार्थ- (तस्य) उन अर्हद्बलि के (अनन्तरं) पश्चात् (माघनन्दिनामा) माघनन्दि नाम के (अनगार पुगव) साधुओं में श्रेष्ठ, (अभूत) हुए, (सोऽपि) वह भी (अनपूर्व देशं प्रकाश्य) अंग और पूर्वो के एक देश का प्रकाशन कर (समाधिना) समाधि-सल्लेखना से (दिवयातः) स्वर्ग को प्राप्त हुए। अर्थ-उन अर्हबलि आचार्य के बाद माघनन्दि नाम के श्रेष्ठ साधु हुए तथा उन्होंने अंग एवं पूर्वो के एकदेश का प्रकाशन कर परम्परा चलाकर समाधिपूर्वक मरण कर स्वर्ग प्राप्त किया। देशे ततः सुराष्ट्र गिरिनगरपुरान्तिकोर्जयन्तगिरौ । चन्द्रगुहाविनिवासी महातपाः परममुनिमुख्यः ॥१०३ । अग्रायणीयपूर्व स्थितपंधमवस्तुगत चतुर्थ महा । कर्मप्राभृतक ज्ञः सूरिधरसेननामाऽभूत् ॥१०५ ।। | श्रुतावतार Ye
SR No.090472
Book TitleShrutavatar
Original Sutra AuthorIndranandi Acharya
AuthorVijaykumar Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size1 MB
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