________________
श्री
अनुकंपा
।
४
मेंठ:
विवरीतोसि थेरा, मो भणनि- मते अण्णो दिट्ठो, ताहे विवादे सा भणति-अहं अप्पाणं सोहेमि, एवं करेहि, ताहे पहाता जसपर बापत्यकालगता, जो कारी सो लग्गति अंतरंडेण वोलेंतओ, अकारी मुच्चति, सा पहाविता, ताहे सो पिसायरूवं काऊणं साडएणं गेण्हति,
घूणोताहे सो तत्थ जक्खं मणनि- जो मम मातापीनीहिं दिणल्लओ तं च पिसायं मोतूण जदि अण्णं जाणामि तो मे तुम जाणसित्ति, उपापाजक्खो विलक्खो चितेति-पेच्छह जारिसाणि मंतेति, अइयपि वैचितो णाए, नन्थि सतित्तणं खु धुत्तीए. जाब चिंतेति ताव सा
सरिडित्ति निष्फिडिता, नाहे थेरो मन्त्रेण लोगेण हीलितो, तस्स ताए अद्धितीय निदा नट्ठा, ताहे रणो कण्णं गतं, ताहे रण्णा अंतेपुरपालओ कतो, आभिमरकं च हन्थिरपणं वासघरम्म हेट्ठा वह अच्छति, देवी इस्थिठेण आसत्तिया, नवार रतिं हन्थिणा हत्यो गवक्खेण पमारिओ, सा उतारिता, पुणरवि पभाने पडिविलइया, एवं वच्चति, अण्णता चिरं जातंति इत्थिमेंठेण इस्थिसंकलाए आहता, सा भणनि-मो एग्गिओ नारिमओ धेरो न मुयति, मा रूसह, तं थेरो पेच्छति, सो चितेति-जदि एताओवि किन्नु ताओ अतिमदिकाओत्ति, एवं नितो मुत्तो, पमाते लोगो सम्बो उडितो, सो न उडेति, रण्णो सिट, राया मणति-सुवत, मत्समे दिवसे | उहितो, रण्णा पुच्छितो, कहिन, जहा एगा देवीण जाणामि कतरावि, एवं संववहरति, ताहे रण्णा भिंडमतो हत्थी कारितो, सवाओ अंतेपुरियाओ मणिनाओ- एतम्स अच्चणिय करेत्ता ओलंडेह, सन्वाहिं ओलंडीओ, सा णेच्छति, मणति-अहं चीहे. |मि, किं च-शकटं पञ्चहस्तेन, दशहस्तेन शृंगिणम् । हस्तिनं शनहस्तेन, देशत्यागेन दुर्जनम् ॥१॥ ताहे रण्णा उप्पलनालन आहता, मुच्छिता किल पडिना, नाइ मे उगतं जहा एमा कारिचि, मणिता य-मत्तगयमारुमतिया, मंडमयस्स गयम्स भायसी । हमुच्छिय उप्पलाहना, नन्थ न मुच्छति संकलाहता ॥१॥ पुट्ठी से जोइया, जाव संकलप्पहारो दिट्ठो, ताहे रण्णा हत्थी मेंठो