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________________ वेसावन सीतलाए विजनविता, ताई मो भगवतो लकिं पामित्ता मणति-से गतमेतं मग । गतमेत भगवंगाणामि जहा तुम सीसो आवश्यक समह, ताहे गोमालो पुच्छति-सामी ! किं एस जयासेज्जातरो पलवति', सामिणो कहितं-जहा पन्नत्तीप, ताहे मीतो पुच्छतिउपोदयात | भगवं । किह सखित्तबिउलतेयलम्मो भवति ?, भगवं भणति-जे णं मोसाला! छछरेण अणिक्खिचेण तवोकम्मेण आपादेवि नियुक्ती पारगए सणहाए कम्मासपिडियाए एगेण व वियडासएणं जावति जाब छम्मासा, सेण संखिचविउलतेयलेस्से मवतित्ति । अभदा सामी कुमग्गामाओ सिद्धत्यपुर संपत्थिनो, पुणरवि निलयंभस्स अदरमामतेण जाव वतिववति ताहे पुच्छद-भगवं जहा न निप्फ॥२९९॥ | णो, मगवता कहितं-जहा निष्फण्णा, तं एवं वणकरण पउपरिहारो, पउटपरिहारो नाम पगवत्य परावयै तस्मिन्नेव सरीरके उववजंति ते, सो असद्दहंतो गतूर्ण तिलसँगलियं हस्धे पष्फोर्डचा ते तिले गणेमाणो भणति एवं सम्बजीवावि पयोदृपरिहारंति, णितिसवाद घणिनमवलंबिता न करोति जं मगवता उपदिद्रु, जहा संखितविपुलतेयलम्सो भवति । ताहे सो सामिस्स मूलाओ ओफिरो सावत्थीए कैमगारसालाए टिनो, तेयनिसर्ग आआवेति, छहि मासेहिं सखित्तविपुलतेयलेस्सो जातो, कूपतडे दामीए विनासितो, पच्छा छहिसाचरा आगता, ताहे निमित्तउल्लाओ से कहितो, एवं सो अजिणो जिणपलावी बिहरति । एसा से अक्त्या। २ वेमालाए परिमं ईिभमुणिओत्ति नत्य गणरापा । पूपति संग्वणामो चित्तो णावाग भगिणिसुतो ४-३७४४९४ भगवपि देसालि पगरि संपत्ता, तत्थ मखो जाम गणगया. सिद्धत्थरमो मिलो, सो त पूजेति, पच्छा वाणिपग्गामं पावितो, का तत्यंतरा गडइना णदी. मामी णायाए उनियो, ते णाविया सामि भणति-देहि मोलं, एवं वाईति, तत्थ संसरभो भाइणेज्जो | चिचो णाम इकाए गएल्लो गावाकडएण पति, ताह तेण भोइतो महितो या उॐ ॥२९॥
SR No.090462
Book TitleAgam 40 Mool 01 Aavashyak Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRushabhdev Keshrimal Jain Shwetambar Sanstha Ratlam
PublisherRushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha
Publication Year1985
Total Pages617
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_aavashyak
File Size18 MB
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