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सोलहकारण धर्म । (१३) प्रवचनक्ति भावना।
प्रवचनभक्ति-अपात जिनागम (जिनेन्द्र भगवानका कहा हा धर्म-जिनवाणो) का अध्ययन, अध्यापन, प्रचार, भक्ति उपासना, पूजा, स्तवनादि करना । जब कोई भव्य जीव सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सपा सम्पचारित्रके बलसे जानावर णादि धार धातिया कर्मोको नाश करके फेवलज्ञानको प्राप्त होता है। और अपने अनंतज्ञान तथा दर्शनसे जाने और देने हुए पदार्थोफा यथावत स्वरूप अपनी निरक्षरीकाणी (दिव्यध्वनि) द्वारा संसारी प्राणियोंके कल्याणार्थ कहता अर्थात् उपदेषा करता है, उनको वह अनवारी वाणी मेघगर्जनाके समान दिनमें तीन वार और मध्यरात्रिको एकवार ऐसे वारवार छ: छः घड़ी तक खिरती है । उसी वाणीको लेकर गणघर .(गणेवा या गणपति) आदि चार शानके शरी मुनीन्द्र (१) आचारांम, (२) सूत्रकृतांप, (३) स्थानांग, (४) समयावांग, (५) व्याख्याप्राप्ति, (६) ज्ञातृकयांग, (७) उपासकाध्ययनांग, (८) अंतकृद्दशांग, (२) अनुत्तरोपदाशांग, (१०) प्रश्नव्याकरणांग, (११) सूत्रविपाक, (१२) दृष्टिप्रवादांग ( इसी बारहवें अंगके १४ पूर्वरूप भेव होते हैं ) इस प्रकार भेदाभेदपूर्वक द्वादशांगरूप कपन करते हैं।
फिर परम्पराचार्य ठीक ज्ञानी जीवोंके सम्बोषनाथं भेद प्रभेद रूपसे सूत्र, गाथा, टीका, टिप्पणी सहित रचकर प्रकापित करते हैं। इसे ही जिनवाणी व जिनागम व प्रवचन आदि कहते हैं। पूर्वकालमें जब श्य, कोष, काम भावोंकी भनुकुलता थी, तब इस क्षेपमें अनेक दिगम्बर मुनियोंके संग