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________________ 卐ऊ॥ ॥ ॥ ॐ ॐ नापि करोति कर्भगुणान् जीवः कर्म तथैव जीवगुणान् । अन्योन्यनिमित्तेन तु परिणामं जानीहि द्वयोरपि ॥१३॥ एतेन कारणेन तु कर्ता आस्मा स्वकेन भावेन । पुद्गलकर्मकृतानां न तु कर्ता सर्वभावानां ॥१४॥ आत्मख्याति:-यतो जीवपरिणामं निमिचीकृत्य पुद्गलाः कर्मत्वेन परिणमंति पुद्गलकर्मनिमिगीकृत्य जीवोपिक परिणमतीति जीवपुद्गलपरिणामयोरितरेतरहेतुत्वोपन्यासेपि जीवपुद्गलयोः परस्परं व्याप्यन्यापकभावाभावाज्जीवस्य पुद्गलपरिणामानां पुद्गलकर्मणोपि जीवपरिणामानां कत कर्मत्वासिद्धौ निमिरानैमित्तिकभावमात्रस्याप्रतिषित्त्वादितरे-4 तरनिमित्तमात्रीभवनेनैव द्वयोरपि परिगामः । ततः कारणान्मृचिकया कलशस्त्रेव स्वेन भावेन स्वस्य भावस्य करणाज्जोवः स्वभावस्य कर्चा कदाचित्स्यात् । मृतिकया वसनस्येव स्वेन भावेन परमात्रस्य कतु मशक्यात्वात्सुद्गलभावानां तु कर्ता ॥ न कदाचिदपि स्यादिति निश्चयः । ततः स्थितमेतज्जीवस्य स्वारिगामेरेव सह का कर्ममावो भोक्तभोग्यभावश्च ।। अर्थ-पुद्गल हैं ते जीवके परिणाम हैं निमित जाकू ऐसा कर्मवणारूप परिणमे हैं । तैसें ही 卐 जीव है सो भी पुद्गलकर्म है निमित्त जा• ऐसा कर्मपणारूप परिणमे है । बहुरि जीव है सो तो .. कर्मके गुणनिकू नाही करे है। बहुरि तेसें ही कर्म है सो जीवके गुणनिकू नाही करे है। इनिज 卐 दौऊनिकै परस्पर निमितकरि परिणाम जानूं । इस कारणकरि आत्मा कर्ता कहिये है सो अपने , ही भावकरि है। बहुरि पुद्गलकर्मकरि किये भाव हैं तिनिका तो सर्व ही का कर्त्ता नाही है। टीका-जाते जीवपरिणाम निमित्तमात्रकरि पुद्गल है सो कर्मभावकरि परिणमे है। ज बहुरि पुद्गलकर्मकू निमित्तमात्रकरि जीव भी परिणमे है। ऐसे जीवके परिणामकै अर पुद्गलके ... परिणामकै परस्पर हेतुपणाका स्थापन होतें भी जीवकै अर पुद्गलके परस्पर व्याप्य व्यापकभावके फ़ + अभावते जीवके तौ पुदगलपरिणामनिका अर पुदगलकर्मके जीके परिणामनिका कर्ताकर्म पणाकी असिद्धि होते निमित्तनैमित्तिक भावमात्रका प्रतिषेध नाहीं है । यातें परस्पर निमित्तमात्र + होनेही करि दोऊनिका परिणाम है, तिसकारणतें मृत्तिका कलशको ज्यौं अपने भावकरि अपने ·乐 乐乐 乐乐 乐乐 乐乐 乐乐 $ $ ॐ ॐ ॐ ॐ
SR No.090449
Book TitleSamayprabhrut
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherMussaddilal Jain Charitable Trust Delhi
Publication Year1988
Total Pages661
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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