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________________ स्था० क० टोका एवं हिन्दी विवेचन ] कारणों में उसका भी समावेश नहीं होगा अतः वायु में रूपाभाव के प्रतियोगी रूप का उपलम्भकप्रागभाव न होने पर भी वायु में रूपाभाव के प्रत्यक्ष में अपेक्षित योग्यता अक्षुण्ण रहने से वायु रूपाभाव के प्रत्यक्ष को अनुपपत्ति नहीं होगी । ११ [ अन्योन्याभावप्रत्यक्ष की आपत्ति का परिहार ] इस संदर्भ में यह ध्यान रखने को बात है कि प्रस्तुत योग्यता संसर्गाभाव के प्रत्यक्ष में अपेक्षित है, अन्योन्याभाव के प्रत्यक्ष में नहीं । अतः स्तम्भ में अतीन्द्रिय पिशाचादि के अन्योन्याभाव के प्रत्यक्ष की आपत्ति नहीं हो सकती । संसर्गाभाव प्रत्यक्ष में भी प्रतियोगी और प्रतियोगी उपलम्भ के असाधारण कारण से भिन्न प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्न के यावत् उपलभ्भ साधनों का समवधान हो योग्यता के रूप में ग्राह्य है । अत एव 'पिशाचवटी नास्ति' इस प्रकार के पिशाचावच्छिनघटनिष्ठप्रतियोगिताक अभाव के प्रत्यक्ष की प्रापत्ति नहीं हो सकती । गुण में रूपाभाव के प्रत्यक्ष की अनुपपत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि रूपाभाव के प्रतियोगी रूपउपलम्भ के प्रति महत्त्व समवायसम्बन्ध से कारण न होकर एकार्थसमवाय यानी स्वसमवायिसमवाय सम्बन्ध से कारण होता है और इस सम्बन्ध से घटादिगत महत्त्व घटादिगत गुण में भी है, अतः गुण में भी रूपाभावप्रत्यक्ष की अपेक्षित योग्यता विद्यमान होने से उसमें भी रूपाभाव का प्रत्यक्ष होने में कोई बाधा नहीं है । सोऽयमनुपपन्नः, असाधारणत्वस्य दुर्वचत्वात् विषयतासंबन्धेन हेतुत्वरूपाऽसाधारणत्वविवक्षण आलोकसंयोगादेरप्यसाधारणत्वापत्तौ तमसिं घटाभावादेः प्रत्यक्षतापातात् प्रागभावादर्शय साधारणत्वात् उपलम्भपदेन प्रतियोगितावच्छेदकाश्रयाणां यावतामुपलम्भस्वरूपयोग्यत्वग्रहणे महति वायायुद्भूतरूपाभावाऽप्रत्यक्षतापत्तेः, अणुरूपोपलम्भाऽप्रसिद्धेः यक्तिचिदुपलम्भयोग्यत्वग्रहणे च रूपसामान्याद्यभावप्रत्यक्षतापतेः । किञ्च यत्किञ्चित्संबन्धेन तदुपलम्भकतावच्छेदकाश्रय सच्चमतिप्रसक्तम्, नियतसंबन्धेन च रूपादेवयावभावात् तत्र तदभावप्रत्यक्षतानापत्तिः । [ परिष्कृत योग्यता निर्वचन में त्रुटियाँ ] तो इस प्रकार यद्यपि उदयनाचार्य सम्मत योग्यता का परिष्कृत निर्वाचन आपाततः सम्भव प्रतीत होता है, किन्तु व्याख्याकार सूचित रीति से विचार करने पर यह भी संगतिपूर्ण प्रतीत नहीं होता। क्योंकि प्रतियोगिउपलम्भ के असाधारणकारणत्व को व्याख्या दुर्बच है । जैसे, यदि प्रतियोगी उपलम्भ के प्रसाधारणकारण का अर्थ किया जायगा 'विषयतासम्बन्ध से प्रतियोगीउपलम्भ के प्रति कारण' तो भलोकसंयोग भी घटाभाव प्रतियोगी घट के उपलम्भ का असाधारणकारण हो जायगा क्योंकि विषयतासम्बन्ध से घट उपलम्भ के प्रति आलोकसंयोग समवाय सम्बन्ध से कारण होता है । फलतः प्रतियोगी उपलम्भ के इतर कारणों में आलोकसंयोग का संनिवेश न होने से उसके अभाव में भी योग्यता उपपन्न हो सकेगी अतः अन्धकार में भी घट की योग्यानुपलब्धि बन जाने से घटाभावादि के प्रत्यक्ष की प्रापत्ति होगी । दूसरा दोष यह होगा कि प्रतियोगी के उपलम्भ का प्रागभाव भी प्रतियोगी उपलम्भ का असाधारण कारण न होगा क्योंकि वह आत्मनिष्ठ होने के कारण विषयनिष्ठ न होने से विषमतासम्बन्ध
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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