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________________ १६२ [ शास्त्रवा० स्त० ६ श्लो० ४३-४४ शय होने से प्रसत्तुल्यतया सदृशदर्शनतुल्य होने पर भी वस्तुगत्या सशविषयक न होने से सादृश्य के प्रतियोगी के नाशग्रह का प्रतिबन्धक नहीं हो सकता।-तब भी बौद्धमत में यह दोष निर्यार है कि सादृश्य दूग्रंह होने के कारण 'युर्वक्षण के नाश का आग्रह सदृशग्नहहेतक है यह कथन ही अनुपपन्न है। यह है कि जो विषय अज्ञात होता है उसका कथन नहीं हो सकता क्योंकि कथन शब्दरूप है और शब्दप्रयोग में शब्दार्थज्ञान कारण होता है। इसी आशय को ग्रन्थकार ने एस्तुत कारिका के उत्तरार्म से सूचित किया है, जिसका अर्थ यह है कि 'गृह्यमाणक्षण पूर्वगृहीत के सदृश है' यह ज्ञान बौद्धमत में कैसे हो सकता है ? क्योंकि पूर्वक्षण का साइश्य पूर्वक्षणभेवघटित है और उत्तरक्षणग्रहणकाल में पूर्वक्षण के विद्यमान न होने से पूर्वक्षण का ग्रहण न होने के कारण उसके भेव से घटित सादृश्यज्ञान का कोई उपाय न होने से 'उत्तरक्षण पूर्वक्षण के सदृश है यह ज्ञान किसी प्रकार सम्भव नहीं है ।।४२॥ ४३ वो कारिका में उत्तरक्षण में पूर्वक्षण के सादृश्यज्ञान न होने से सम्भावित दोष का प्रतिपादन किया गया है तदगती को दोषः ? इत्यत आइमूलम्-तथागतेरमावे च वचस्तुच्छमिदं ननु । सदृशेनावरुद्धत्वात्तद्ग्रहाद्धि तदग्रहः ॥४३॥ तथागतेः भेदयरिच्छित्तेः अभावे च सति, इदं प्रागुक्तम् भवतो वचः, 'ननु' इत्याक्षेपे तुच्छ असारम् , अन्ययाऽबोधकत्वात् । किम् ? इत्याह-यदुत 'सदृशेनावरुद्धत्वात् तद्ग्रहाद्धि तदग्रहः' [ का० ४० ] इति ॥ ४३ ॥ पूर्वक्षणभेदघटितपूर्वक्षण सादृश्यज्ञान का अभाव होने पर बौद्ध का यह पूर्वोक्त बचन कि'तुल्य उत्तरक्षण से अवरुद्ध हो जाने के कारण पूर्वक्षण के नाश का अग्रह पूर्वक्षणसदृश उत्तरक्षराग्रह से होता है-निःसार हो जायगा, क्योंकि वह शाब्दबोध का जनक न हो सकेगा ॥ ४३ ॥ बौद्ध की ओर से यदि यह आशंका की जाय कि 'उत्तरक्षण के दर्शन में पूर्वक्षण के भेद का उल्लेख न होने पर भी उत्तरक्षण के लविकल्पकग्रह में पूर्वक्षण के भेद का उल्लेख होने ने से साश्य का विशिष्ट ग्रह सम्भव है प्रतः पूर्वक्षणसदृश उत्तरक्षण से पूर्वक्षण के नाश का अग्रह होता है इस वचन की अनुपपत्ति कसे हो सकती है ?' तो इस आशंका का उत्तर का० ४४ में दिया गया है - दर्शने भेदानुल्लेखेऽपि विकल्प तदुल्लेखात सादृश्यविकल्पसंभवात् कथमुक्तवचसोउनुपपत्तिः ? इत्याशङ्कायामाहमूलम्-भावे वास्या यलादेकमनेकत्रहणात्मकम् । अवयि ज्ञानमेष्टव्यं सर्व तक्षणिकं कुतः ? ॥४४॥ भावे वाऽस्याः मेदगतेः बलात्-अस्वरसादपि, अनेकग्रहणात्मक-पूर्वापरब्रहणरूपम् एकमन्वयि ज्ञानमेष्टव्यम् , अन्यथा भेदग्रहदशायां प्रतियोगिबहाभावात् तद्ग्रहानुपपत्तेः, प्रदीर्घपर्यालोचनानुपपत्तश्च । यत एवम् तत्-तस्मात् सबै क्षणिकं कृतः ? उक्तवानस्यवान्वायकत्वान् ? ॥ १४ ॥
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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