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________________ [ शास्त्रवा० स्त. लो०३७ लग सकता । यदि यह कहें कि-'नोलमात्र और पीतमात्र रूप से विशिष्ट कपालिकाहय से जो नीलपीत कपाल उत्पन्न होता है उसमें अवच्छेदकतासम्बन्ध से तत्कपालगतनोलरूप की आपत्ति होगी। क्योंकि-तत्कपालगतरूप अवयवरूप होने से कारण हो सकता है तो यह भी ठीक नहीं है क्योंकिनील-कपालिकाविशिष्ट तत्कपालाबच्छेदेन तस्कपाल में अवच्छेदकतासम्बन्ध से तत्कपालगतनोलरूप की उत्पत्ति इष्ट है। यदि कहें तरकपालगतनोलरूप में नीलकपालिकाविशिष्ट तत्कपालावच्छेद्यत्व अनुभवविरुद्ध है तो अवच्छेदकतासम्बन्ध से नोलादि के प्रति समवायसम्बन्ध से नीलेतररूपादि को विरोधी मानकर उक्त प्रापत्ति का परिहार हो सकता है।" [ व्याप्यवृत्ति रूप में सावच्छिन्नत्य की आशंका का परिहार ] किन्तु विचार करने पर व्याप्यवत्तिरूप के अवच्छेदक का प्रम्युपगम कर प्रयच्छेदकतासम्बन्ध से नीलादि के प्रति समवाय से नीलादि को कारण मानना उचित नहीं प्रतीत होता। क्योंकि जब उक्त नोलपीतकपाल में अवच्छेवकता सम्बन्ध से तत्कपालगतरूप को उत्पत्ति की आपत्ति का परिहार करने के लिये प्रयच्छेदकता सम्बन्ध से नोलादि में समवाय से नीलेतररूपादि को प्रतिबन्धक मानना आवश्यक ही है तब अवच्छेदकतासम्बन्ध से नीलाव के प्रति समवाय से नीलादि को कारण मानने में कोई प्रमाण नहीं बच जाता । इस पर यदि यह कहें कि-'उक्त कार्यकारणभाव न मानने पर नीलपीतकपाल से उत्पन्न घट में उत्पन्न होने वाले नीलरूप की नीलकपाल में अवच्छेदकतासम्बन्ध से उत्पत्ति न हो सकेगी क्योंकि प्रबच्छेदकत्तासम्बन्ध से नीलरूप का कोई कारण नहीं है तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि नीलपोतकपालारब्ध घट में नील-पोत दो रूपों की उत्पत्ति मानते की अपेक्षा लाघव से एक चित्ररूप की उत्पत्ति मानना हो प्रामाणिक है तथा व्याप्यवत्ति का अवच्छेदक होने में कोई यक्ति न होने से नीलकपालमात्र से न होने वाले घटनिष्ठ नीलरूप की भी नीलकपाल में अवच्छेदकतासम्बन्ध से उत्पत्ति के अनुरोध से उक्त कार्यकारणभाव नहीं माना जा सकता और अब अवच्छेवकता सम्बन्ध से नीलादि के प्रति कोई कारण नहीं है, तब प्रयच्छेदकतासम्बन्ध से नीलादि के प्रति नोलेतररूपादि को प्रतिबन्धक मानने को भी आवश्यकता नहीं है । यदि च व्याय्यवृत्ति का अवच्छेदक मान कर अवच्छेदकता सम्बन्ध से नीलादि के प्रति समन सम्बन्ध से नीलादि की कारणता मानी जायगी और नीलमात्र एवं पीतमात्र कपालिकादय से उत्पन्न नीलपीतकपाल में अवच्छेदकता सम्बन्ध से नीलोत्पत्ति का परिहार करने के लिये समवाय से नीलेतर रूप को प्रतिबन्ध माना जायगा तो अवच्छेदकता सम्बन्ध से नोलेतरादिरूप के प्रति समवायसम्बन्ध से नीलादि को प्रतिबन्धकता के साथ विनिगमनाविरह होगा। अत: उचित यही है कि व्याप्यवृत्ति का अवच्छदक न माना जाय और नीलपीतादि कपालों से उत्पन्न घट में नोलपोतादि की उत्पत्ति न मान कर एक चित्ररूप की ही उत्पत्ति मानी जाय । और अवच्छेवकता सम्बन्ध से नीलादि के प्रति समवायसम्बन्ध से नीनादि की कारणता का परित्याग कर दिया जाय । __ यदि च स्वाश्रयसंबन्धेन नीलं प्रति स्वव्यापकसमवायेन नीलरूपं हेतुरुपेयते, नीलपीताद्यारब्धस्थले च स्वाश्रयसंबन्धेन नीलरूपस्य पीतकपालेऽपि संभवेन व्यभिचाराद् रक्तसंबन्धेन हेल्वभावादेव न तत्र नीलोत्पत्तिरिति विभाव्यते, तदा नीलं प्रति नौलेतररूपादेः प्रतिबन्धकरवं चित्ररूपवादिना न कल्पनीयमित्यतिलाघवम् । एवं च 'सामानाधिकरण्यसंबन्धाऽवच्छिमप्रति
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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