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________________ १६६ [ शास्त्रवा० स्त० ६ लो० ३७ नानारूपवत्कपालारब्धघटस्य नीलरूपादेनीलकपालिकावच्छेदेनानुत्पत्तिप्रसङ्गात्, तदद्वयविनि कपाले रूपसत्त्वात् । अपि च, नीलपीतवत्यग्निसंयोगात्, कपालनीलनाशात् तदवच्छेदेन रक्त न स्यात्, समत्रायेन रूपं प्रति तेन रूपस्य प्रतिबन्धकल्वान, तद्वछिन्नरूपे तदवच्छिन्नरूपस्य प्रतिवन्धकत्वकल्पने चातिगौरवम् । [अव्याप्यवृत्तिरूप बादो नव्यमत में विशेष गौरव ] रूप के प्रव्याप्यवृत्तित्व पक्ष में प्रयच्छदकतासम्बन्ध से रूप उत्पन्न हो जाने के बाद पुनः उसी सम्बन्ध से अवयव में रूप की उत्पत्ति का धारण करने के लिये अवच्छेदकतासम्बन्ध से रूप के प्रति अबछेदकता सम्बन्ध से रूप को प्रतिबन्धक मानना ही होगा अतः रूप के प्रव्याप्यवृत्तित्व पक्ष में प्रतिबन्धकता को इस कल्पना का गौरव है । यदि यह कहा जाय कि-"जो रूप अवयवी में समयायसम्बन्ध से उत्पन्न होता है, वही अवयव में अवच्छेदकता सम्बन्ध से उत्पन्न होता है । अतः अवयवी में समवाय से रूपोत्पादकसामग्नी अवयव में अवच्छेदकप्ता सम्बन्ध से रूपोत्पत्ति में अपेक्षित होती है। इसलिए अवयवोगतरूप जब अवच्छेदकता सम्बन्ध से अवयव में उत्पन्न हो जाता है तब उस समय अवयवी में समवाय से रूपोत्पादक सामग्री नहीं रहती, क्योंकि समवाय से रूप के प्रति समवाय से रूप की प्रतिबन्धकता वरुप्त है। अत: उक्त सामग्री के अभाव से ही अवयव में अवच्छेदकता सम्बन्ध से रूपोत्पत्ति की आपत्ति नहीं हो सकती। अतःप्रवच्छेश्कता सम्बन्ध से रूप के प्रति अवच्छेवकतासंबन्ध से रूप को पथक प्रतिबन्धक मानने को प्रावश्यकता न होने से उक्त गौरव नहीं हो सकता ।" तो यह ठीक नहीं है क्योंकि अवयविनिष्ठरूप को प्रतिबन्धक मानने पर अवयविनिष्ठरूपाभाव को भी अवच्छेवकता सम्बन्ध से रूप के प्रति कारण मानना होगा। फलतः नोल-पीत कपाल द्वय से उत्पन्न घट में नीलकपालिकावच्छेदेन नोलरूप की अनुत्पत्ति का प्रसंग होगा, क्योंकि नीलकपालिका के अवयवी कपाल में रूप विद्यमान रहता है । इसके अतिरिक्त दूसरा दोष यह है कि नील-पीत उभयरूपवान् घट में अग्निसंयोग से कपाल के नील का नाश होने पर तत्कपालावच्छेदेन घर में रक्तरूप की उत्पत्ति न हो सकेगी क्योंकि समवाय से रूप के प्रति समवाय से रूप प्रतिबन्धक होता है, अतः उक्त घट में पोतकपालावच्छेवेन पीतरूप रहने से समवाय से रूप की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? यदि इस आपत्ति के परिहार के लिये तक्वच्छिन्न रूप के प्रति तवच्छिन्नरूप को प्रतिबन्धक माना जायगा तो प्रतिबध्यप्रतिबन्धकभाव की अवच्छेदक कुक्षि में प्रवच्छेदक विशेष का निवेश करने से अवच्छेदकभेद से प्रतिबध्य-प्रतिवन्धक भाव बाहुल्य प्रयुक्त महान् गौरव होगा। अथावच्छिन्नानीलादौ नीलाभावादिषदकमवयवगतमव यविंगतं च हेतुः, रक्तनीलारब्धे रक्तनाशकपाकंन व्याप्यतिनीलोत्पत्तिदशायां चावयविनि न नीलाभावः, इति न तत्रावच्छिन्ननीलोत्पत्तिः नीलमात्रारब्धे पाकन क्वचिद्रक्तरूपोत्पत्तौ च प्राक्तननीलनाशादेवायच्छिन्ननीलोत्पत्तिरिति चेत् ? म, नील-पीत-श्वेताद्याब्धे श्वेताद्यवच्छेदेन नीलजनकपाके सति प्राक्तननीलनाशेन तत्तदवच्छिन्ननानानीलकल्पनापेक्षयकचित्रकल्पनाया एव लघुत्वात् । ___ अथ व्याप्यवृत्तिरूपस्याप्यवच्छेदकस्वीकारादवच्छेदकतया नीलादिकं प्रत्येव समवायेन नीलादेहेतुत्वम् । न चैवं घटेऽपि तया नीलाधापत्तिः, अवयवनीलत्वेन द्रव्यविशिष्टनीलत्वेन
SR No.090420
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 5 6
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size7 MB
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