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________________ [ शा. वा. समुभषय स्व०-४ श्लोक-16 - तेनामाव इति श्रुतिः क्व निहिता किंवा सत्कारणं स्वाधीना कलशस्य केवलमियं दृष्टा कपालावली ॥१॥ इति । अथ कालविशेषविशिष्टाधिकरणेनैवाभावान्यथासिद्धाक्वयव्यादेरप्यसिद्धिप्रसङ्ग इति चेत् ? न, कालविशेषस्य द्रव्यपर्यायोमयरूपत्वेन तस्यैवाभावाऽवयव्यादिरूपत्वस्येष्टत्वाव , शबलवस्त्वम्युपगमे दोषामावादिति दिक् । प्राभाकरास्तु-घटषद्भुतलबुद्धिभिन्ना भूतलबुद्धिर्धटामावः । न च घटवति घटाऽज्ञानदशायां तदभावापत्तिः, अन्याभावानभ्युपगमात् , तद्वयवहारस्य च प्रतियोग्यधिकरणाने यावत्प्रतियोग्युपलम्मकसरचे चेष्टत्वात् । [विभक्त कपालखंड ही घटनाश है] "घट. मुद्गर और मुद्गरप्रहार के बाद कपाल समूह, बस इतनी हो वस्तुएँ देखने में प्राती है। इनसे प्रतिरिक्त प्रभाव जैसी कोई वस्तु देखने में नहीं आती। अत: मुगरपात के बाद कपाल समूह के वर्णन के समय जो प्रभाव पद का प्रयोग सुनने में प्राता है उसका कोई अतिरिक्त प्रर्थ और उसका कोई कारण युक्ति द्वारा उपलब्ध नहीं, होता, कलश का केवल कपालसमूह रूप एक परिणाम मात्र ही दृष्टिगोचर होता है।"-इससे स्पष्ट है कि घटनाश कोई अतिरिक्त वस्तु नहीं है अपि तु घट के उपर मुद्गर का अभिघात होने पर कपालों के विभाग होने से जो पविभक्त कपाल समूह की उत्पत्ति दृष्टिगोचर होती है वह घट का नाश है। नयायिक को प्रोर से इस पर यह शङ्का की जा सकती है कि "यदि कालविशेषविशिष्टाधिकरण से ही प्रभाव को अन्यथासिद्ध किया जायेगा तो अवयवी आदि की मी प्रसिद्धि हो जायेगी। मर्थात् घट भी एक अतिरिक्त द्रव्य न हो कर घटानुभव कालविशेष विशिष्ट कपालसमूह स्वरूप ही रह जायेगा"। किन्तु यह शङ्का अनिष्ट मापादक नहीं है । क्योंकि कालविशेष यह द्रव्यपर्यायउभयरूप होता है और यही प्रभाव और अवयवी माधि रूप भी होता है। उससे अतिरिक्त प्रभाव पौर प्रवयवी प्रावि की सत्ता नहीं होती । इस पर यह शङ्का करना भी उचित नहीं है कि-द्रव्य स्थिर होता है और पर्याय क्षणिक होता है इसलिये उभयरूपात्मक कोई वस्तु नहीं हो सकती-" क्योंकि शवल वस्तु प्रर्थात् अपेक्षामेव से परस्पर विरोधी अनेक रूपात्मक वस्तु स्वीकारने में कोई दोष नहीं हो सकता। माशय यह है कि द्रव्य और तवाश्रित पर्याय-प्रवाह से मतिरिक्त काम की सत्ता नहीं है, इसलिये कालविशेषविशिष्टाधिकरण का अर्थ होता है पर्यायविशिष्ट द्रव्य । घामाव यह भूत का एक पर्याय है, उस पर्याय से विशिष्ट भूतल से भतिरिक्त घटामाव की सत्ता नहीं होती । इसी प्रकार घटादि अवयवी मो मिट्टीद्रव्य का पर्याय है। पर्याय होने से उसको कालविशेष कहा जाता है और उस घटात्मक पर्यायरूप काळ विशेष से विशिष्ट मिट्टीव्यसे अतिरिक्त घटापि अवयवी की ससा मी नहीं होती। मतः कामविशेषविशिष्टाधिकरण से अतिरिक्त मधवषी की सिद्धि का मापावान इष्ट ही है।
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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