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________________ स्वा०क० टीका और हिन्दी विवेचना ] [ tee सामान्य को मानना आवश्यक है उसी प्रकार एक स्तम्भ का जोग्रनेक काल तक एकाकार अनुगत ज्ञान होता है उस ज्ञान को ही विभिन्न क्षणों में परिवर्तित होने वाली स्तम्भ की विभिन्न अवस्थाओं में एक अनुगत सामान्य का ग्राहक मानना होगा जिसे ऊध्वंतासामान्य कहा जा सकता है, जो क्रम से उत्पन्न होनेवाले विभिन्न पर्यायों में द्रव्यरूप से अनुगत होता है। यदि इस ऊयंता सामान्य का अपलाप किया जायेगा तो एककालिक विभिन्न गो श्रादि व्यक्तियों में समान प्रतीति के उत्पादक गोarfa तिर्यक् सामान्य का भी अपलाप हो सकता है, जिसके फलस्वरूप जगत् के प्रतिभास का प्रभाव अर्थात् जगत् में होने वाली प्रतोतियों के बंधस्य के प्रभाव की प्रसक्ति होगी । इसके समाधान में यह मो नहीं कहा जा सकता कि रतिर्यक सामान्य न होने पर भी जगत् सांश होने से अंशों के वैषम्य के कारण प्रतोतिषम्य की उपपत्ति हो सकती है' - बूँकि बौद्धमत में जगत् निरंश क्षणिक अनेक परमाणुस्वरूप है । बौद्ध मत में परमाणु समूह से अतिरिक्त प्रवयवीरूप जगत् का अस्तित्व नहीं है । ( प्रतोति के बल पर लोकसिद्ध पदार्थों के स्वीकार की प्रापत्ति) यदि यह कहा जाय कि 'जगत् परमाणु समूह से अतिरिक्त भले न हो किन्तु प्रत्येक परमाणु स्वयं-स्वभावतः एकदूसरे से विषित-मित्र है । प्रतः परमाणुओं के वैषम्य से प्रतीतिषम्य की उपपत्ति हो सकती है तो यह कथन मो युक्तिहीन होने से श्रद्धेय है। चूँकि यदि स्वतः परस्पर विलक्षण प्रनंत परमाणुत्रों की सत्ता स्वीकार की जा सकती है तो जिन विभिन्न रूपों में जगत् के विभिन्न पदार्थों को प्रतीति लोकसिद्ध है उन रूपों में उन पदार्थों के अस्तित्व का भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता । इस सम्बन्ध में यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि जैसे विकल्पमुक्त प्रर्थ से विकल्पमुक्त दर्शन का जन्म होता है उसी प्रकार कार्यकारण में साहत्य का नियम होने से reeder वर्शन से foकल्पमुक्त हो विशिष्ट ज्ञान की भी उत्पत्ति होनी उचित है। ऐसा होने पर, विश्व में विकल्पात्मक ज्ञान को कथा ही समाप्त हो जायगी। उक्त नियम के अभ्युपगम की दूसरी स्थिति यह है कि तवाकार तदुत्पन्न ज्ञान तदर्थ का प्रध्यवसाय ही उत्पन्न करता है। किन्तु यह स्थिति भी स्वीकार्य नहीं हो सकती क्योंकि उसे स्वीकार करने परवागवाहिक निविकल्पक के सन्तान को उपपत्ति न हो सकेगी। चूंकि इस स्थिति को मानने पर निविकल्पक अर्थाव्यवसाय सविकल्पज्ञानमात्र को ही उत्पन्न करेगा, अतः द्वितीय तृतीय प्रादि निर्विकल्पक ज्ञान की उत्पति न हो सकेगी। ( स्वभावभेद के बिना श्रत्यन्तायोग को अनुपपत्ति ) उस नियम के अगम को सीसरी स्थिति यह है कि तदाकार तदुत्पन्न ज्ञान प्रर्थविषयक अध्यवसाय का अनक होता है । यह स्थिति तदाकार तदुत्पक्ष ज्ञान में तदर्थविषयक श्रध्यवसाय की जनता के प्रत्यन्तायोग के व्यवच्छेद पर निर्भर है किंतु यह व्यवच्छेव तदाकार- तदुत्पन्न मानों में स्वभाव भेद मानने पर हो सम्भब हो सकता है क्योंकि स्वभाव मेव के ही प्राधार पर यह कहा जा सकता है कि अमुक स्वभावोपेत तदाकार तदुत्पन्न ज्ञान तदर्थाध्यवसाय का जनक है और अमुक स्वमायोपेत उक्तज्ञान तदर्थाध्यवसाय का प्रजनक है इसलिये तदाकार तदुत्पन्न ज्ञान में अर्थाध्यवसायजनकता का प्रयोग तो हो सकता है किन्तु अत्यन्तायोग नहीं हो सकता है। स्वभावमेव से तदाकार तदुत्पन्न ज्ञान को तदर्थ के प्रध्यवसाय का अजनक मानने पर सदाकार, तदुत्पन्न, तदर्थ के
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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