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________________ १२० ] [ शा० वा० समुचय स्त० ४ श्लो० ६५ पक्षबोधक वाक्य में बुद्धिपद के स्थान पर प्रत्यक्षपद का सन्निवेश करना होगा अन्यथा स्मृति प्रनुमिति प्रादि भो पक्षान्तर्गत होगी किन्तु उस में विशेषण- विशेष्य सम्बन्धजन्यत्व न होने से बाघ होगा। यदि पक्षतावच्छेवक सामान की उद्देश्य रखेंगे तो 'दण्डवाला पुरुष इस बुद्धि में साध्य सिद्ध होने से सिद्धसाधन होगा । इसी प्रकार हेतु में भी बुद्धि के स्थान में प्रत्यक्ष का निवेश करना होगा अन्यथा विशिष्टविषयक सत्यबुद्धित्व स्मृति श्रनुमिति प्रावि में साध्य का व्यभिचारी हो जायगा। इसलिये उक्त अनुमान इस रूप में पर्यवसित होगा कि गुणक्रियावि विशिष्टविषयक प्रत्यक्ष विशेषण विशेष्यसम्बन्ध जग्य है, क्योंकि वह विशिष्ट विषयक सत्यप्रत्यक्ष है, जो भी विशिष्टविषयक सत्य प्रत्यक्ष होता है यह विशेषण विशेष्य सम्बन्धजन्य होता है जैसे 'दण्ड वाला पुरुष' यह विशिष्ट विषयक सत्यप्रत्यक्ष है । यतः इस अनुमान से विशिष्ट विषयक बुद्धि के सम्बन्धविधया जनक रूप में समवाय की सिद्धि अपरिहार्य है ।" (साध्य में सम्बन्धजन्यत्व का परिष्कार प्रसंगत - ) नैयायिकों का उपरोक्त वक्तव्य भो ठोक नहीं है, क्योंकि गुणादिविशिष्ट विषयकप्रत्यक्ष में विशेषणसम्बन्ध को विशेषणसम्बन्धस्वरूप से कारण नहीं माना जा सकता चूंकि सम्बन्धत्व यह विषयत्वादि अनेक पदार्थों से घटित होने के कारण जनकतावच्छेदक नहीं हो सकता यह बात मिश्र (सम्भवतः पक्षधर मिश्रा ने कही हैं । धिकरणता सम्बन्ध व्यधिकरण है अत एव उस सम्बन्ध से उक्त प्रकारताओं का अभाव विशेष्यता में रहेगा अतः ज्ञानों की विशेष्यता उक्त उमयसम्बन्ध से प्रकारता विशिष्ट हो जायगी। किन्तु यह मी ठीक नहीं है चूंकि ऐसा करने पर रजत में स्वरूपतः रजतत्वप्रकारक प्रमा में भी उक्तउभयसम्बन्ध से प्रकारता विशिष्ट विशेष्यता रहेगी क्योंकि उक्तज्ञान की रजतत्व निष्ठप्रकारता भी स्वावच्छेदकसम्बन्धाबच्छिन्न स्वाषच्छेदकधर्मावलिन्नाधिकरणता व्यधिकरण सम्बन्ध होगा अत एव वक्त सम्बन्ध से उक्त प्रकारता के अभाव का अधिकरण रजत होगा फलतः उक्त ज्ञान की रजतनिष्ठविशेष्यता रजतत्वनिष्ठप्रकारता से विशिष्ट हो जायगो भतः तादृशविशेष्यताशून्यस्य न होने से वक्त प्रमालाक ज्ञान मी सर्वांश मेम न हो सकेगा ।" किन्तु इन सब दोष का सर्वांशे भ्रम भिन्नत्व का निम्नप्रकार से निर्वचन करने से परिहार हो सकता है। प्रकारता विशिष्टविशेष्यता शून्यत्व ही सर्वांशे भ्रममित्व का अर्थ है | प्रकारता शिष्टय अपेक्षित है स्वनिरूपकत्व और स्वपिशिष्ट आधेयतानिरूपिताधिकरणत्वसम्बन्धावकिन्न प्रतियोगिता कस्वा मानवनिरूपितवृत्तित्वमयसम्बन्ध इन दो संबन्ध से। आधेयता में स्ववैशिष्ट चार सम्बन्ध से सामानाधिकरण्य, स्वावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्नत्व, स्वानवच्छेदकधर्मावच्छिन्न और स्त्राrत्रकलेवक धर्मानत्रच्छिन्नत्वसम्बन्धान्नस्ववृतित्व इस चतुष्टय सम्बध से । इसप्रकार निर्वच करने से रजतन में स्वरूपतः रजतत्वप्रकारक प्रभा में सवांश में भ्रम मिन्नत्व की उत्पत्ति होने में कोई बाधा न होगी, क्योंकि उस ज्ञान की रजतत्वनिष्ठसमवायसम्बन्धावच्छिन्न निश्कारता से विशिष्ट समवायसम्बन्धावकिन्नर ज तत्वनिष्ठ निरवच्छिन्न आवेषता होगी। तन्निरूपित अधिकरणता रजत में विद्यमान है, अत एव स्वविशिष्ट आवेयता निरूपित अधिकरणता सम्बन्ध से उस प्रकारता का भ्रमाव रजत में नहीं रहेगा। अतः उक्तवान में उक्त उभय सम्बन्ध से प्रकारता विशिष्टविशेष्यता शून्यत्व है ।
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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