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________________ चतुर्थ प्रकाश ३५ वृति-काँटे आदिको बाड़ लगाते हैं उसी प्रकार मुनि व्रतोंको रक्षाके लिये समितियोंको धारण करते हैं। ईर्या भाषा आदिके भेदसे समिति पाँच प्रकारकी मानी गई हैं अर्थात समितिके ईर्या, भाषा, एषण, आदान निक्षेपण और व्युत्सर्ग ( प्रतिष्ठापना ) ये पांच भेद हैं। अब आगमके अनुसार इनका कुछ लक्षण दिखाता हूँ॥ २-३ ॥ अव सर्वप्रथम ई समितिका वर्णन करते हैं प्रमादरहिता अत्तिः समितिः सन्निरूप्यते । चर्यार्थ तोर्थयात्रार्थ गुरूणां वन्दनाय च ॥ ४ ॥ जिनधर्मप्रसाराय मुनीनां गमनं भवेत् । तडागारामशैलाविवर्शनाय न साधयः ।। ५॥ विहरन्ति कदाचिव व लौकिकानन्दहेतवे । रजन्यां तमशानभागीयां न बजन्ति ते ॥ ६ ॥ सति सूर्योदये मार्गे दृष्टतत्रस्थवस्तुके । नृगवाश्वखराचीनां यातायातबिमदिते ।। ७ ।। हरिघासाघसंकीणे साधवो विहरन्ति हि । दण्डप्रमितभूभागं पश्यन्तः संव्रजन्ति ते ॥ ८॥ न मन्दं नातिशीघ्नं च विहरन्ति मुनीश्वराः। शौचबाधानिवृश्यर्थ रात्री चेटु गमनं भवेत् ॥९॥ विवाविलोकिते स्थाने पिच्छेन परिमार्जिते । वाधांनिवर्तयेत्साधुः करपृष्ठपरीक्षिते ॥ १० ॥ क्षबजन्तुकरक्षार्थ निरुपमा व्रजन्ति ते। सभ्यम् विलोकिते क्षेत्र साधूनां बिहतिभवेत् ॥ ११॥ पादनिक्षेपवेलायां कश्चन क्षुद्रजन्तुका । आगत्य चेन्मति यायान्त साधोस्तस्तिमित्तकः ॥ १२ ॥ सूक्ष्मोपि वशितो बन्ध आचार्य हि जिनागमे । प्रमाद एव बन्धस्य यतो हेतुः प्रदशितः ॥ १३ ॥ पघामेव साधूनां विहारो जिनसम्मतः । अतो यात्रादिकव्याजाद गल्लानः शियिकाश्रयम् ।। १४ ॥ बण्डयत्येव स्वस्येसमिति नात्र संशयः । भवेनिःश्रेयसप्राप्तिनिर्दोषाचरणेन हि ॥ १५ ।। अर्थ-प्रमादसे रहित वृत्ति समिति कहलाती है । चर्या, तीर्थयात्रा, गुरु-वन्दना और जिनधर्मके प्रसारके लिये मुनियोंका गमन होता है । तालाब, बाग तथा पर्वत आदिको देखने के लिये तथा लौकिक आनन्दके
SR No.090411
Book TitleSamyak Charitra Chintaman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year
Total Pages234
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size4 MB
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