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________________ १०६ सम्यक् चारित्र-चिन्तामणि: लेता है ऐसी वर्षा ऋतु में वृक्षोंके नीचे वर्षायोग धारणकर तप करते हैं और जब समस्त पृथिवीतल तप्त हो जाता है ऐसी ग्रीष्म ऋतु में संतप्त पर्वतपर आतापन नामक महायोग धारणकर योगी स्थित होते हैं। ध्यान में तत्पर रहने वाले मुनि, बोर्याचारके मध्य नाना आसन धारणकर सघन वनमें विद्यमान रहते हैं ।। ११७-१२४ ।। आगे पश्चाचार प्रकरणका समारोप करते हैं पञ्चाधारमयं तपोऽत्र विधिना धूत्वा तपस्यन्ति ये ते क्षिप्रं निविडं स्वकर्मनिगई भित्वा शिवं यान्ति कँ । भोमय्यास्तपसां प्रभावमतुलं वृष्ट्वा तपेयुश्चिरात् मोतं ते भवबन्धनाद्यवि मनः कस्य प्रतीक्षा तव ।। १२५ ॥ अर्थ - जो मुनि इस जगत् में विधिपूर्वक पश्चाचार रूप तपको धारण कर तपस्या करते हैं वे निश्चयसे शीघ्र हो कर्मरूपी सुदढ़ बेटीको काटकर मोक्षको प्राप्त होते हैं । ग्रन्थकार कहते हैं- हे भव्यजन हो ! यांदे तुम्हारा मन संसारके बन्धन से भयभीत हुआ है तो तपका अनुपम प्रभाव देखकर दीर्घकाल तक तप करो। तुम्हें किसकी प्रतीक्षा है ? ।। १२५ ।। इस प्रकार सम्यक् चारित्र-चिन्तामणिमें पश्चाचारका वर्णन करनेवाला सप्तम प्रकाश पूर्ण हुआ । अष्टम प्रकाश अनुप्रेक्षाधिकार मङ्गलाचरणम् विपद्यमानं भुवनं विलोक्य ये वीतरागा भवतो विभीताः । धरन्ति दीक्षां भुविमाननीयां तांस्तानहं भक्तिभरण नौमि ॥ १ ॥ अर्थ - संसारको नष्ट होता देख रागरहित जो पुरुष संसारसे भयभीत हो पृथिवोपर माननीय दोक्षाको धारण करते हैं उन प्रसिद्ध मुनियोंको में भक्तिभारसे नमस्कार करता हूँ ।। १ ।
SR No.090411
Book TitleSamyak Charitra Chintaman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year
Total Pages234
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size4 MB
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