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________________ पष्ठ प्रकाश अर्थ--लोभरूपो वायुसे जिसको धैर्यरूपी कील उखाड़ दी गयो है तथा जो दीनताको दुकान जैसा बन रहा है ऐसे मैंने परिग्रहमें आसक्तहो कौन-कौन विचित्र चेष्टाएं नहीं को हैं ? ॥ २५ ॥ पापेन पापं वचनीयरूपं मया कृतं यज्जनता प्रभो ! तत् । वाचा न बार्य मयका कथंचित् । समस्तवेवो तु भवान् विवेद ।। ८६ ॥ अर्थ-हे जनजनके नाथ ! मुझ पापाने जो निन्दनीय कार्य किया है उसे मैं वचनोंसे नहीं कह सकता। आप सर्वज्ञ हैं अतः सब जानते हैं ॥८६॥ स्वयाजनाया विहिता अपापाः संप्रापिताः सौख्यसुधासमूहम् । ममापि तत्पापचयः समस्तो ध्वस्त : सदा स्याद् भवतः प्रसावात् ।। ८७ ।। अर्थ-आपने अंजन चोर आदि पापियोंको पापरहित कर सुखामृतके समूहको प्राप्त कराया है। अतः आपके प्रसादसे मेरे भी समस्त पापोंका समूह नष्ट हो ॥ ७ ॥ ममास्ति दोषस्य कृतिः स्वभाव भवत्स्वभावस्तु तदीयनाशः। यद् यस्य कायं स करोतु तत् तत् न वार्यते फस्यचन स्वभावः ।। ८८॥ अर्थ-मेरा पाप करना स्वभाव है और आपका उस पापको नष्ट करनेका स्वभाव है। अतः जिसका जो कार्य है वह उसे करे क्योंकि किसोका स्वभाव मिटाया नहीं जा सकता॥८॥ विशेषार्थ-यहाँ मूलाचार और आचार्यवृत्तिके आधारपर "कृतिकम' पर कुछ स्पष्टोकरण किया जाता है। सामायिक स्तवपूर्वक कायोत्सर्ग करके चतुविशति तीर्थकर स्तव पर्यन्त जो क्रिया है उसे 'कृतिकर्म' कहते हैं। प्रतिक्रमणमें चार और १. यही उत्तमार्थ प्रतिक्रमणको दृष्टिमें रखकर जीवनके समस्त कार्योको प्रकट किया गया है । वैसे साधु अवस्या में यह सब अपराध सम्भव नहीं है।
SR No.090411
Book TitleSamyak Charitra Chintaman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year
Total Pages234
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size4 MB
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