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________________ सम्यग्ज्ञानचन्द्रिका भाव टोका 1 [ ३ बहुरि चकार तँ विशेष ऐसी भी मार्गणास्थान की संज्ञा गाथा विषै विना कही भी जानती । 2. आगे प्ररूपणा का दोय प्रकार पना विषै अवशेष प्ररूपणानि का अंतर्भूतपना दिखावे हैं - आदेसे संलीणा, जीवा पज्जत्तिपाणसण्णाओ । जवओगोवि य भेद, वीसं तु परूवणा भणिदा ॥ ४ ॥ श्रादेशे संलीना, जीवाः पर्याप्तिप्राणसंज्ञाश्च । उपयोगोऽपि च भेदे, विशतिस्तु प्ररूपणा भणिताः ॥४॥ टीका – मार्गणास्थानप्ररूपणा fat arreare, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा, - उपयोग - ए पांच प्ररूपणा संतींना कहिए गर्भित हैं, किसी प्रकार करि तिनि माणानि विष अंतर्भूत हैं । तैसे होते गुणस्थानप्ररूपण पर मार्गणास्थानप्ररूपण संपेक्षा करि प्ररूपणा दोय ही निरूपित हो हैं । आगे किस मार्गणा विषे कौन प्ररूपणा गर्भित है ? सो तीन गाथानि करि कहै हैं - इंदियकाये लीणा, जोवा यज्जत्तिआणभासमणो । जोगे काओ णाणे, अक्खा गदिमगणे आऊ ॥ ५ ॥ इंद्रियाययोर्लोना, जीवाः पर्याप्त्यानभाषासनांसि | योगे कायः ज्ञाने, प्रक्षोणि गतिमार्गणाधामायुः ॥५॥ टीकर - इंद्रियमाणा विषै, बहुरि कार्यमार्गणा विषै जीवसमास भर पर्याप्ति. अरे सोश्वास, भाषा, मनबल प्राण ए अंतर्भूत हैं । कैसे हैं ? सो कहे हैं - जीवसमास अपर्याप्त इनिकै इंद्रिय पर कायसहित तादात्म्यंकरि कोया हुवा एकत्व संभव है । जीवसमास र पर्याप्ति ए इंद्रिय -कायरूप हो हैं । बहूरि सामान्य- विशेष करि कीया हूवा एकत्व संभव है। जोवसमास, पर्याप्ति पर इंद्रिय, काय विषै कहीं सामान्य का ग्रहण है, कहीं विशेष का ग्रहण है । बहुरि पर्याप्तिनि के धर्म-धर्मीकरि कीया हुवा. . एकत्व संभव है । पर्याप्त धर्म है, इंद्रिय-काय धर्मी हैं । तातें जीवसमास र पर्याप्त
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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