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________________ सम्पनामचन्द्रिका माथा टीका ] । ६५३ धनांगुल का असंख्यातवां भाग प्रमाण जघन्य अवगाहना के जेते प्रदेश हैं, तितनी बार तौ तसे ही उपज्या, पीछे तहां स्यों एक प्रदेश आकाश का उसके निकटवर्ती, ताकौं रोकि करि उपज्या, असे अनुक्रम ते एक - एक प्रदेश करि सर्व लोकाकाश के प्रदेशनि कौं अपना जन्मक्षेत्र कर, सो यह सर्व परक्षेत्र परिवर्तन है। उक्त च सर्वत्र जगरक्षेत्रे, देशो न झस्ति जंतुनाऽक्षण्णः । . .. अवगाहनानि बहुशो बंभ्रमता क्षेत्रसंसारे ॥ : . क्षेत्र संसार विर्षे भ्रमण करता जीव करि जाका अपने शरीर की अवगाहना करि स्पर्श न कीया असा सर्व जगछ णो का घन प्रमाण लोक विर्षे कोई प्रदेश नाहीं है । बहुरि जाकी बहुत बार अंगीकार ने कीया, असा कोई अवगाहना का भेद भी । प्राग काल परिवर्तन कहिये हैं- .. ... कोई जीव उत्सर्पिणी काल का पहिला. समय विर्षे उपज़्या, अपना प्रायु कौं पूर्ण करि मूवा । बहुरि दूसरा उत्सपिणी काल का दूसरा समय विष उपज्या, अपना प्रायु कौं पूर्णकरि मूवा । बहुरि तीसरी उत्सपिरणी काल का तीसरा समय विर्षे उपज्या, तसे ही मुवा । असे दश कोडाकोडि सागर प्रमाण उत्सपिणी काल के जेते समय हैं, तिनको पूर्ण करै। बहुरि पीछे इस ही अनुक्रम ते दश कोडाकोडि प्रमाण अवसर्पिणी काल के जेते समय हैं, तिनको पूर्ण करै । बहुरि जैसे जन्म की अपेक्षा कह्या, अनुक्रम तैसे ही मरण की अपेक्षा अनुक्रम जानना । पहिले समय विष मूवा, दूसरे समय विर्षे मूवा, असें कल्पकाल समयनि कौं पूर्ण करै, सो यह सर्व मिल्या हूआ काल परिवर्तन जानना । उक्तं च-- उत्सपिण्यवसपिरिणसमयावलिकासु निरबशेषासु । जातो मृतश्च बहुशः, परिभ्रमन् कालसंसारे । काल संसार वि भ्रमण करता जीव, उत्सर्पिणी अवसर्पिणीरूप कल्प काल * का समस्त समय, तिनकी पंकति विर्षे कम ते बहुत बार जन्म धऱ्या है, अर मरण कीया है। प्रागै भव परिवर्त कहे हैं-- ___कोऊ जीव नरक गति विर्षे जघन्य प्रायु दशहजार वर्ष की धारि उपज्या, • पीछे मरण करि संसार विर्षे भ्रमण करि तहां ही जघन्य दश हजार वर्ष की आयु कौं -
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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