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________________ Fivideronमामmami ६२६ ] । गोम्मसार जीवका गाया ५४४ बहुरि मध्य विर्षे लोक एक राजू चौडा, सो बघता बघता ब्रह्मास्वर्ग के निकट पांच राज भया । सो इहां मख एक राज, भूमि पांच राज मिलाए छह हवा, ताका प्राधा तीन, बहुरि ब्रह्मस्वर्ग साढा तीन राजू ऊंथा, सो गच्छ का प्रमाण साढा तीन करि गुणिये, तब आधा ऊर्ध्व लोक का क्षेत्रफल साढा दश राजू हुआ । बहुरि ब्रह्मस्वर्ग के निकट पांच राजू सो घटता घटता अपरि एक राजू का रह्या, सो इहां भी मुख एक राजू, भूमि पांच राजू, मिलाए छह हुआ, प्राधा तीन, सो ब्रह्मस्वर्ग के ऊपरि लोक साढा तीन राजू है, सो गच्छ भया, ताफरि गुण, प्राधा उर्ध्व लोक का क्षेत्रफल साढा दश राज हो है। जैसे उर्ध्वलोक पर अधोलोक का सर्व क्षेत्रफल जोडै, जगत्पतर भया, सो असें लंबाई चौडाई करि तो जगत्प्रतर प्रमाण प्रदेश हो हैं । बहुरि बारह अंगुल प्रमाण उत्तर - दक्षिण दिशा विर्षे ऊंचे हो हैं; सो जगत्प्रतर कौ बारह सभ्यंगलनि करि गरग. एक जीव संबंधी क्षेत्र बारह अंगल गणा जगत्प्रतर प्रमाण हो हैं । बहुरि इस समुद्घातवाले जीव चालीस हो हैं । ताते चालीस करि सिस क्षेत्र को गुरणे, च्यारि से अस्सी सूच्यमुलनि करि गुण्या हा जगत्प्रतर प्रमाण उत्तराभिमुख स्थित कपाट विर्षे क्षेत्र हो है। बहुरि स्थिति.विर्षे बारह अंगुल की ऊंचाई कही । उपविष्ट विर्षे तातै तिगुणी छत्तीस अंगुल की ऊँचाई है । तातें पूर्वोक्त प्रभारण तें तिगुणा चौदा से चालीस सूच्यंगुलनि करि गुण्या हवा अगत्प्रतर प्रमाण उत्तराभिमुख उपविष्ट कपाट विष क्षेत्र जानना । बहुरि प्रतर समुद्धातविर्षे तीन वातवलय बिना सर्व लोक विर्षे प्रदेश व्याप्त हो हैं । तातें तीन वातवलय का क्षेत्रफल लोक के असंख्यातवें भाग प्रमाण है। सो यह प्रमाण लोक का प्रमाण विर्षे घटाएं, अवशेष रहे, तितना एक जीव संबंधी प्रतर समुद्धात विर्षे क्षेत्र जानना । h - - ibamaANGANDUTONOKARAcancanomenom बहुरि लोक पूरण विर्षे सर्व लोकाकाश विर्षे प्रदेश व्याप्त हो हैं। ताते लोक प्रमाण एक जीव संबंधी लोक पूरण विर्षे क्षेत्र जानना । सो प्रतर अर लोक पुरण के बीस जोक तौ करनेवाले पर बोस जीव समेटनेबाले असे एक समय विर्षे चालीस पाइए । परन्तु पूर्वोक्त क्षेत्र ही विर्षे एक क्षेत्रावमाहरूप सर्व पाइए; तातै क्षेत्र तितना ही जानना । बहुरि दंड अर कपाट विष भी बीस जीव करनेवाले बीस समेटनेवालेनि की अपेक्षा चालीस जीव हैं; सो ए जीव जुदे जुदे क्षेत्र की भी रोके; तातें दण्ड पर कपाट विर्षे चालीस का गुणकार का । यह जीवनि का प्रमाण उत्कृष्टता की अपेक्षा है। ANE
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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