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________________ EAR.............:.: । गोम्मटसार जीवकाण्ड गाबा ५१९ । संख्यात गुणा है, उत्कृष्ट विशेष अधिक है । बहुरि सात अपकर्षनि करि श्रायु कौं बांधता जीव के छठा अपकर्ष विष प्रायु का बंधने काजधन्य काल तिसत संख्यातगुणा है, उत्कृष्ट विशेष अधिक है । बहुरि छह अपकर्षनि करि प्रायु कौं बांधता जीव के छठा अपकर्ष विषं मायु बंधने का जघन्य काल तिसत संख्यातगुणा है; उत्कृष्ट किछु अधिक है । जैसे एक अपकर्ष करि आयु की बांधता जीव के तीहि अपकर्ष के उत्कृष्ट काल पर्यंत बहतरि (७२) भेद हो हैं। तहां जघन्य तें उत्कृष्ट तो अधिक जानना । सो तिस विवक्षित जघन्य की संख्यात का भाग दौएं, जो पावै, सो विशेष का प्रमाण जानना । ताकौं जघन्य में जोड़ें उत्कृष्ट का प्रमाण हो है । बहुरि उत्कृष्ट ते पागला जघन्य, संख्यात गणां जानना। अॅसं यद्यपि सामान्यपने सबनि विर्षे काल अंतहत मात्र है। तथापि हीनाधिकपना जानने की अनुक्रम कहा है, जो अपकर्षनि विर्षे प्रायु का बंध होइ, तौ इतने इतने काल मात्र समयप्रबद्धनि करि बंध हो है । . __यह बहत्तरी भेदनि की रचना है । तहां पाठ अपकर्षनि करि अायु बंधने की रचना विर्षे पहिली पंक्ति के कोठानि विष जो आठ - आठ का अंक है, ताका तो यह अर्थ जानना - जो आठ अपकर्षनि करि श्रायु बांधने वाले का इहां ग्रहण है । बहुरि दूसरी, तीसरी पंक्तिनि विर्षे प्रा०, सात प्रादि अंक है, तिनिका यह अर्थ - जो तिनि आठ अपकर्षनि करि बंध करने वाले जीव के पाठवां, सातवां आदि अपकर्षनि का ग्रहण है । तहां दूसरी पंक्ति विष जघन्य काल अपेक्षा ग्रहण जानना । तीसरी पंक्ति विषं उत्कृष्ट काल अपेक्षा ग्रहण जानना । जैसे ही सात, छह, पांच, च्यारि, तीन, दोय, एक अपकर्षनि करि आयु बंधने की रचना विषं अर्थ जानना। आठौं रचनानि की दूसरी, तीसरी पंक्तिनि के सर्व कोठे बहतरि हो है । इनि बहत्तरि स्थाननि विर्षे प्रायु बंधने के काल का अल्प -- बहुत्व जानना । मध्य भेदनि के ग्रहण निमित्त जघन्य उत्कृष्ट के बीचि बिदी की सहनानी जाननी । ___ असे आयु कौं बंधने के योग्य लेश्यानि का मध्यम आठ अंश, तिनकी आठ अपकर्षनि करि उत्पत्ति का अनुक्रम कहा। सेसहारससा, चउगइ-गमणस्स कारणा होति । सुक्कुक्कस्संसमुदा, सम्वद्धं जांति खलु जीवा ॥५१६॥ शेषाष्टादशांशाश्चतुर्गतिगमनस्य कारणानि भवन्ति । शुक्लोत्कृष्टांशमृताः, सर्वार्थ यान्ति खलु जीवाः ॥५१६।। ht -- -
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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