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________________ ५७० । [ गोम्मटसार औषका माथा ४६२-४६३-४६४ T TER समाजमा - H HARITERMIMADIRAiri amaS ओहिरहिदा तिरिक्खा, मदिरणाणिअसंखभागगा मणुगा। संखेज्जा हु तदूणा, मविणाणी ओहिपरिमाणं ॥४६२॥ अवधिरहिताः तिर्यंचः, मतिज्ञान्यसंख्यभागका मनुजाः । संख्येया हि तवूनाः, मतिज्ञानिनः अवधिपरमारणम् ॥४६२॥ टीका - अवधिज्ञान रहित तिर्यंच, मतिज्ञानी जीवनि की संख्या कही । तीहि के असंख्यातवें भाग प्रमाण है । बहुरि अवधिज्ञान रहित मनुष्य संख्यात हैं, ए दोऊ राशि मतिज्ञानी जीवनि की जो संख्या कही थी; तिसमें स्यों घटाइ दीएं जो अवशेष प्रमाण रहै, तितने च्यार्यो गति संबंधी अवधिज्ञानी जीव जानने । पल्लासंखघणंगल-हव-सेढि-तिरिक्ख-गदि-विभंगजुदा । गर-सहिदा किंचूणा, चदुगदि-वेभंगपरिमारणं ॥४६३॥ पल्यासंख्यधनांगुलहतश्रेरिणतिर्यग्गतिविभंगयुताः । नरसहिताः किचिनाः, चतुर्गतिभंगपरिमारणम् ।।४६३॥ टोका - पल्य का असंख्यातवां भाग गुरिणत घनांगल करि जगन्छे रणी कों गुरिणए, जो प्रमाण होइ, तितने ती तिर्यंच । बहुरि संख्याते मनुष्य । बहुरि धनांमुल का द्वितीय मूल करि जगच्छ पो कौं गुरिगए, तितना नारकीनि का प्रमाण है । तामै सम्यग्दृष्टी नारकी जीवनि का परिमाण घटाएं, जो अवशेष रहै, तितना नारकी । बहरि ज्योतिषी देवनि का परिमाण विर्षे भवनवासी, व्यंतर, वैमानिक देवनि का परिमाण मिलाए, सामान्य देवराशि होइ । तामै सम्यग्दृष्टी देवनि का परिमाए घटाएं, जो अवशेष रहै, तितने देव, इनि सबनि का जोड दीए, जो प्रमाण होइ, तितने च्यार्यो गति संबंधी विभंगज्ञानी जानने । सण्णाण-रासि-पंचय-परिहोणो सन्वजीवरासी हु। मदिसुद-अण्णाणीणं, पसेयं होदि परिमाणं ॥४६४॥ सज्ज्ञानरशिपंचकपरिहीनः सर्वजीवराशिहि । मतिश्रुताज्ञानिना, प्रत्येकं भवति परिमाणम् ॥४६४॥ Premra
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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