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________________ स म स्यामानाindainsurabenanamitaminimalitimainna सभ्यम्जामचन्तिका भाषादीका टोका - प्राट कमंनि का समुदायरूप जो समय प्रबद्ध का प्रमाण तीहिं विर्षे बिनसोपचय के परमाण न मिलाइए, तिन ही की एक बार मन:पर्ययज्ञान संबंधी ध्रुवहार का भाग दीएं, जो प्रमाण प्रावै, तितने परमाणु नि का स्कंध कौं विपुलमति मनःपर्यय का दूसरा भेदरूप ज्ञान जान है। सन्विदियं कप्पारणमसंखेज्जाणं च समयसंखसमं । धुवहारेणवहरिदे, होवि हु उक्कस्सयं दध्वं ॥४५४॥ तद्वितीयं कल्पानामसंख्येयानां च समयसंख्यासमम् । ध्रुवहारेगावहूते, भवति हि उस्कृष्टक द्रव्यम् ॥४५४॥ टीका - तिस विपुलमति के दूसरे भेद संबंधी द्रव्य करें तिस ही ध्रुवहार का भाग दीजिए, जो प्रमाण प्रावै, ताकी फेरि ध्रुवहार का भाग दीजिए । असे असंख्यात कल्पकाल के जेते समय हैं; तितनी बार ध्रुवहार का भाग दीजिए, देते देते अंत विष जो परिमाण रहै, तितने परिमाणूनि का स्कंध कौं उत्कृष्ट विपुलमतिज्ञान जाने हैं; असें द्रव्य प्रति जघन्य - उत्कृष्ट भेद कहे हैं । गाउयपुधसमवरं, उक्कस्सं होदि जोयणपुधत्तं । विउलमदिस्स य अवरं, तस्स पुधत्तं वरं खु परलोयं ॥४५॥ गम्यूतिपृथक्त्वमवरमुत्कृष्टं भवति योजन पृथक्स्यम् । विपुलमतेश्च अवरं, तस्य पृथक्त्वं वरं खलु नरलोकः ।।४५५।। टीका - ऋजुमति का विषयभूत जघन्य क्षेत्र पृथक्त्व कोश प्रमाण है, सो दोय, तीन, कोश प्रमाण जानना । बहुरि उत्कृष्ट क्षेत्र पृथक्त्व योजन प्रमाण है, सो सात वा पाठ योजन प्रमाण जानना । बहुरि विपुलमति का विषयभूत जघन्य क्षेत्र पृथक्त्व योजन प्रमाण है, सो आठ का नव योजन प्रमाण जानना । बहुरि उत्कृष्ट . क्षेत्र मनुष्य लोक प्रमाण है। परलोए ति य वयणं, विक्खंभणियामयं ण वस्स । । जह्मा तम्घणपदरं, मणपज्जवखेतमुद्दिठं ॥४५६।। नरलोक इति च वचनं, विष्कभनियामक न वृत्तस्य । यस्मातद्धनप्रतरं, मनःपर्ययक्षेत्रमुद्दिष्टम् ॥४५६॥ .
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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