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________________ ना भाटीका | ३७१ टीका - जिन प्रात्मनि के पुण्य पापरूप कर्म प्रकृति के बंध करें उपजावन हारे शुभरूप वा अशुभरूप मन, वचन, काय के योग न होहि ते प्रयोगी जिन.. चौदह्वां अंत गुणस्थानवतीं वा गुणस्थानातीत सिद्ध भगवान जानने । कोऊ जानेगा कि योगति के अभाव तें उनके बल का प्रभाव है । जैसे हम सारिखे जीवनि के योगनि के माश्रयभूत बल देखिए है । तहां कहिए हैं । कैसे हैं-सिद्ध ? 'अनुपमानंतबलकलिताः' कहिए जिनके बल कौं हम सारिखे जीवनि का बल की उपमा न बने है । बहुरि केवलज्ञानवत् अक्षयानंत अविभाग प्रतिच्छेद लोएं है, जैसा बल-वीर्य, जो सर्व द्रव्य-गुण- पर्याय का gava ग्रह की समर्थता, तींहि करि व्याप्त है। तीहि स्वभाव परिगए हैं । araft का बल कर्माधीन है । तातें प्रमाण लीए है; अनंत नाहीं । परमात्मा का बलं केवलज्ञानादिवत् आत्मस्वभावरूप है । ताते प्रमाण रहित अनंत है। सा जानना । आगे शरीर का कर्म पर नोकर्म भेद दिखावे हैं - - ओरालियवेगुब्विय, आहारयतेजणामकम्मुदये । चउणोकम्मसरीरा, कम्मेव य होदि कम्मइयं ॥ २४४॥ श्रौलिर्वविकाहारकते जो नामकर्मादये । चतुनकर्मशरीराणि, कर्मैव च भवति कार्मणम् ॥ २४४॥ टीका - श्रदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजसरूप जो नामकर्म की प्रकृति तिनके उदय तैं जे ए प्रदारिक आदि व्यारि शरीर होंइ, ते नोकर्म शरीर जानने । नो शब्द का दो अर्थ है, एक तौ निषेधरूप पर एक ईषत् स्लोकरूप । सो वहां कार्मारण की ज्यों ए च्यारि शरीर आत्मा के गुण को घात नाहीं वा गत्यादिकरूप न । तातें कर्म तें विपरीत लक्षण धरने करि इनको अकर्म कहिए | वा कर्म शरीर के ए सहकारी है । तातें ईषत् कर्म शरीर कहिए । ae afrat नोकर्म शरीर कहै । जैसे मन को नो-इंद्रिय कहिए हैं; तैसे नोकर्म जानने । बहुरि कार्मारण शरीर नामा नामकर्म के उदय ते ज्ञानावरणादिक कर्म स्कंधरूप कर्म, सोई कर्म शरीर जानना ।
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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