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________________ __... २१४ [ हेमठसार जीबकापड गाथा १०३-१०४ सो जघन्य अवगाहना विर्षे जोडें, तीसरा अवगाहना का भेद होई, सो यहु असंख्यात भाग वृद्धि का दूसरा स्थान है। जैसे ही क्रम करि जघन्य अवगाहना कौं यथायोग्य नामरूणात का भाग ही। तीन, च्यारि, पांच इत्यादि संख्यात असंख्यात पाए, ते जघन्य अवगाहना विर्षे जोडें निरंतर एक-एक प्रदेश की वृद्धि करि संयुक्त अवगाहना के स्थान असंख्यात हो हैं । तिनिकौं उलंधि कहा होइ सो कहैं हैं अवरोग्गाहरणमाणे, जहण्णपरिमिदअसंखरासिहिदे । .. अवरस्सुरि उड्ढे, जेट्ठमसंखेज्जभागस्स ॥१०३॥ प्रवरावगाहनाप्रमाणे, जघन्यपरिमितासंख्यातसशिहते. । ५. अवरस्योपरि वृद्धे, ज्येष्ठमसंख्यातभागस्य. ॥१३॥ टोका - एक जाचगा जघन्य अवसाहना की जघन्य परिमि असंख्यात राशि का भाग दीए, जो प्रमाण आवै, तितने जघन्य अवगाहना विर्षे जोडें जितने होइ, तितने प्रदेश जहां अवगाहना भेद विष होइ, तहां असंख्यात भाग वृद्धिरूप अवगाहना स्थाननि का अंतस्थान हो है । एले ए असंख्यात भाग वृद्धि के स्थान कितने भए ? सो कहिए है -- 'प्रादी अंते सुद्धे वाट्टहि रूवसंजुदे ठाणे' इस करण सूत्र करि असंख्यात भाग वृद्धिरूप अवगाहना का आदिस्थान का प्रदेश प्रमाण की अतस्थान का प्रदेश प्रमाण में स्यौं घटाए अवशेष रहे, ताकी स्थान-स्थान प्रति एक-एक प्रदेश बधता है, ताते एक का भाग दीए भो तितने हो रहैं, तिनमें एक और जोडें जितने होइ, तितने प्रसंख्यात भाग वृद्धि के स्थान जानने। -तस्सवरि इमिपदेसे, जदे प्रवत्तध्यभागपारंभो। वरसंखमवाहिदवरे, रूऊरणे अवरउवरिजुवे ।।१०४॥ तस्योपरि एकप्रदेशे, युसे अबक्तव्यभागप्रारंभः । घरसंख्यातावहितावरे, रूपौने, अवरोपरियुते ॥१०४॥ टोका -- पूर्वोक्त असंख्यात वृद्धि का अन्त अवगाहना स्थान, तीहि विष एक प्रदेश जुड़े प्रवक्तव्य भाग वृद्धि का प्रारंभरूप प्रथम अवगाहना स्थान हो है । बहरि ताके आमैं एक-एक प्रदेश बधता अनुक्रम करि प्रवक्तव्य भाग वृद्धि के स्थानकनि कौं उलंधि एक बार उत्कृष्ट संख्यात का भाग जघन्य अवमाहना कौं दीए जो ------in DAT E D: --..-....---..-.a mroPERaicu- - -
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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