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________________ १९८ ] [ गोम्मटसार जीयकार गाया ४ EmerpaRNEDRIN भूमियां ते पुरुष वेद, स्त्री वेद का ही उदय संयुक्त नियम करि हैं । तहां नपुंसक न पाइए हैं । इति तीन प्रकार योनिनि का अधिकार जीवसमासनि का कह्या । प्राग शरीर की अवगाहना आश्रय करि जीवसमासनि कौं कहने का है मन जाका, ऐसा आचार्य; सो प्रथम ही सर्व जघन्य अर उत्कृष्ट अवगाहना के जे स्वामी, तिनिका निर्देश करै हैं - सहमणिगोदअपज्जत्यस्स जादस्स तदियसमयम्हि । अंगुलप्रसंखभागं, जहणमुक्कस्सयं मच्छे ॥६४॥ सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तकस्य जातस्य तृतीयसमये । अंगुलासंख्यभाग, अधन्यमुत्कृष्टकं मत्स्ये ॥१४॥ T aramimanaw a ranankikari दीका -- जितना पाकाश क्षेत्र शरीर रोक, ताका नाम इहाँ अवगाहना है । सो सूक्ष्म निगोदिया लब्धि अपर्याप्तक जीव, तोहि पर्याय विर्षे ऋजुगति करि उत्पन्न भया, ताके तीसरा समय विर्षे धनांगुल के असंख्यातवें भाग प्रमारा प्रदेशनि की अवगाह विशेष धरै शरीर हो है । सो यहु अन्य सर्व अदगाहना भेदनि ते जघन्य है। बहुरि स्वयंभूरमण नामा समुद्र के मध्यवर्ती जो महामत्स्य, ताका उत्कृष्ट अवगाहना तें भी सबनि तें सर्वोत्कृष्ट अवगाहना विशेष धरै शरीर हो है । इहां तर्क - जो उपजनें तें तीसरा समय वि सर्व जघन्य अवगाहना कसे संभव है ? लहां समाधान - जो उपजता ही प्रथम समय विर्षे तो निगोदिया जीव का शरीर लंबा बहुत, चौडा थोडा, ऐसा चौकोर हो है । बहुरि दूसरा समय विर्षे लंबाचौडा समान ऐसा चौकोर हो है । बहुरि तीसरे समय कोण दूर करणे करि गोल प्राकार हो है; तब ही तिस शरीर के अवगाहना का अल्प प्रमाण हो है, जातै लंबा चौकोर, सम चौकोर तें गोल क्षेत्रफल स्तोक हो है । . बहुरि तर्क - जो ऐसे हैं तो ऋजुगति करि उपज्या ही के होइ - ऐसे कैसे कहा? । - - - -
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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