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________________ १९६] [ गोम्मटसार कौवकास गापा ६९-१० टीका - असे पूर्वोक्त प्रकार करि सामान्येन कहिए संक्षेप करि नय योनि हैं । बहुरि विस्तार करि चौरासी लाख योनि हैं नियमकरि । भावार्थ - जीव उपजने का आधारभूत पुद्गल स्कंध का नाम योनि है । ताके सामान्यपनै नव भेद हैं, विस्तार करि तिस ही के चौरासी लाख भेद हैं। प्रागै तिनि योनिनि की विस्तार करि संख्या दिखावं हैं - रिपच्चिदरधादसत य, तरुदस वियलेंदियेस छच्चेव । सुरणिरयतिरियचउरो, चोइस मणुए सदसहस्सा ॥५॥ नित्येतरधातुसप्त च, तरुदश दिकलेंद्रियेषु षट् चेव । . सुरनिरयतिर्यक्चतस्रः, चतुर्दश मनुष्ये शलसहस्राः ॥८९।। टीका - नित्य निगोद, इतरनिगोद पर धालु कहिए पृथ्वीकायिक, जल कायिक, तेजस्कायिक वायुकायिक इनि छहों स्थाननि विर्षे प्रत्येक सात-सात लाख योनि हैं । बहुरि तरु जो प्रत्येक वनस्पति, तिनि विष दश लाख योनि हैं । बहुरि विकलेंद्रीरूप बेंद्री, तेंद्री, चौद्री इनि विर्षे प्रत्येक दोय-दोय लाख योनि हैं । बहुरि देव, नारकी, पन्द्री तिर्यंच इनि विर्षे प्रत्येक च्यारि-च्यारि लाख योनि हैं । बहुरि मनुष्यनि विर्षे चौदह लाख योनि हैं । असे समस्त संसारी जीवनि के योनि सर्व मिलि चौरासी लाख संख्यारूप प्रतीति करनी। आग गतिनि का आश्रय करि जन्मभेद को गाथा दोय करि कहै है - उववादा सुररिणरया, गन्भजसमुच्छिमा हु एरतिरिया । सम्मुच्छिमा भणुस्साऽपज्जता एयवियलक्खा ॥६०॥ उपपादाः सुरनिरयाः, गर्भजसंमूछिमा हि नरतिर्यचः। सम्भूछिमा मनुष्यर, अपर्याप्ता एकविकलाक्षाः ॥९॥ टीका - देव अर नारकी उपपाद जन्म संयुक्त हैं । बहुरि मनुष्य पर तिथंच ए गर्भज अर सम्पूर्छन यथासंभव हो हैं । तहां लब्धि अपर्याप्तक मनुष्य अर एकेंद्रिय विकलेंद्रिय ए केवल सम्मूच्र्छन ही हैं। - womanaman - Sonarendramuaketer
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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