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________________ गोम्मटसार जीवका गाया ६२-६३ MADAAR -- १६८ ] कतकफलयुतजलं वा शरदि सरसपानीयं च निर्मल । • सकलोपशांतमोह, उपशांत कषायको भवति ॥६१॥ टीका - कतकफल का चूर्ण करि संयुक्त जो जल, सो जैसे प्रसन्न हो है अथवा मेघपटल रहित जो शरत्काल, तीहि विर्षे जैसे सरोबर का पानी प्रसन्न हो है, ऊपरि तें निर्मल हो है; तैसे समस्तपने करि उपशांत भया है मोहनीय कर्म जाका, सो उपशांत कषाय है । उपशांतः कहिए समस्तपनेकरि उदय होने को अयोग्य कीए हैं कषाय नोकषाय जानें, सो उपशांत कषाय है। जैसी निरुक्त करि अत्यंत प्रसन्न- . चित्तपना सूचन किया है । आगे क्षीण कषाय गुणस्थान का स्वरूप कौं प्ररूप हैं - रिणस्सेसखीणमोहो, फलिहामलभायणदयसमचित्तो। खीणकसानो भण्णदि, रिणग्गंथो बीयरायहि ॥६२॥ 'निश्शेषक्षीणमोहः, स्फटिकामलभाजनोदकसमचित्तः । क्षीणकषायो भण्यते, निर्ग्रन्यो वीतरागः ॥६२॥ टीका - अवशेष रहित क्षीण कहिए प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेश करि रहित भई है मोहनीय कर्म की प्रकृति जाक; सो निःशेष क्षीणकषाय है । असे निःशेष मोह प्रकृतिनि का सस्व करि रहित जीव, सो क्षीण कषाय है । ता कारण से स्फटिक का भाजन विषं तिष्ठता जल सदृश प्रसन्न -- सर्वथा निर्मल है चित्त जाका असा क्षीणकषाय जीव है, असें वीतराग सर्वज्ञदेवनि करि कहिए है । सोई परमार्थ करि निम्रन्थ है । उपशांत कषाय भी यथाख्यात चारित्र की समानता करि निर्ग्रन्थ है, असे जिनवचन विर्षे प्रतिपादन करिए हैं । भावार्थ - उपशांत कषाय के तौं मोह के उदय का अभाव है, सत्त्व विद्यमान है । बहुरि क्षीणकषाय के उदय, सत्त्व सर्वथा नष्ट भए हैं; परन्तु दोऊनि के परिणामनि विर्षे कषायनि का अभाव है । तातें दोऊनि के यथाख्यात चारित्र समान है । तीहिकरि दोऊ बाह्य, अभ्यंतर परिग्रह रहित निर्ग्रन्थ कहे हैं। आमै सयोगकेवलिगुणस्थान कौं गाथा दोय करि कहैं हैं - केवलरणारणदिवायरकिरणकलावप्पणासियण्णायो। गवकेवललद्धग्गमसुजरियपरमप्पववएसो ॥६३॥२ i sa.. ENIPuranatal - - १. पखंडायम - अवला पुस्तकः १, पृष्ठ १९१, गाथा १२३ २, षट्खंडागम - धवला पुस्तक १, पृष्ठ १६२, पाथा १२४
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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