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________________ सम्यशानचन्द्रिका भाषाका ] [ १४५ समय संबंधी परिणाम का प्रथम खण्ड विर्षे जोडै, द्विचरम समय संबंधी अनुकृष्टि का अंत खंड का परिणाम पुज का प्रमाण हो है । बहुरि यामै एक अनुकृष्टि चय घटाएं, तिस ही द्विचरम समय का द्विचरम खंड का प्रमाण हो है । असे अधःप्रवृत्तकरण के काल का द्विचरम समय संबंधी अनुकृष्टि खंड, ते अनुकृष्टि का गच्छप्रमाण हैं, ते क्रम ते एक-एक चय अधिक स्थापन करने । असे तिर्यक्रचना जो बरोबर रचना, तीहि विर्षे एक-एक समय संबंधी खंडनि विर्षे परिणामनि का प्रमाण कहा। भावार्थ - पूर्व प्रध:करण का एक-एक समय विषं संभवते नाना जीवनि के परिणामनि का प्रमाण कहा था । अब तिस विर्षे जुदे जुदे संभवते असे एक-एक समय संबंधी खंडनि विर्षे परिणामनि का प्रमाण इहां कहा है । सो ऊपरि के अर नीचे के समय संबंधी खंडनि विर्षे परस्पर समानता पाइए है । तातें अनुकृष्टि असा नाम इहां संभव है। जितनी संख्या लीयें ऊपरि के समय विषं परिणाम खड हो हैं, तितनी संख्या लीये नीचले समय विर्षे भी परिणाम खण्ड होइ हैं। जैसे नीचले समय संबंधी परिणाम खंड से ऊपरि के समय संबंधी परिणाम खण्ड विर्षे समानता जानि इसका नाम अधःप्रवृत्तकरण कह्या है । बहुरि इहां विशेष है, सो कहिए है। प्रथम समय संबंधी अनुकृष्टि का प्रथम खण्ड, सो सर्व से जघन्य खण्ड है; जाते सर्वखण्ड नि ते याकी संख्या पाटि है । बहुरि अंतसमय संबंधी अंत का अनुकृष्टि खण्ड, सो सर्वोत्कृष्ट है; जाते याकी संख्या सर्व खण्डनि तें अधिक है; सो इन दोऊनि के कहीं अन्य खण्ड करि समानता "नाही है । बहुरि अवशेष ऊपरि समय संबंधी खण्डनि के नीचले समय संबंधी खण्ड नि सहित अथवा नीचले समय संबंधी खण्ड नि के ऊपरि समय संबंधी खण्डनि सहित यथासंभव समानता है। तहां द्वितीय समय तें लगाय विचरम समय पर्यंत जे समय, लिनका पहला-पहला खण्ड पर अंत समय का प्रथम खण्ड से लगाइ द्विचरम खण्ड । पर्यंत खण्ड, ते अपने-अपने ऊपरि के समय संबंधी खंडनि करि समान नाहीं हैं । तरत संदेश हैं, सो द्वितीयादि द्विचरम पर्यन्त समय संबंधी प्रथम खण्डनि की ऊर्ध्वरचना कीए । अर ऊपरि अंत समय के प्रथमादि द्विचरम पर्यन्त खण्डनि की तिर्यक् रचना कीए अंकुश के प्राकार रचना हो है। ताते याकौं अंकुश रचना कहिए । यह पक संदेष्टि ५४ ५३ ५२ ५१ ५० ४६ ४८४ ४६ ४५ ४४ ४३ ४२ ४१ 7.1 SE 1-Non.
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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