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________________ १२२ ] [ गrterere. जोवर गाथा ४४ बहुरि सोलह कषाय र नव नो कषाय भेद करि कषाय पचीस हैं । बहुरि स्पर्शन, रसन, प्राण, चक्षु, श्री पन नाम धारक इंद्रिय यह हैं । बहुरि स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, निद्रा, प्रचला भेद करि निद्रा पांच हैं । बहुरि स्नेह, मोह भेद करि प्रणय दोय हैं। इनकों परस्पर गुण, पांच अधिक सैंतीस हजार प्रमाण हो हैं ( ३७५०० ) । ए भी मिथ्यादृष्टि आदि प्रमत्तसंयत गुणस्थान पर्यंत प्रवते हैं । जे बीस प्ररूपणा, तिनि विषै यथासंभव बंध का हेतुपणाकरि पूर्वोक्त संख्या आदि पांच प्रकार लीए जैनागम तं श्रविरुद्धपने जोड़ने ! अब प्रमादनि के साड़ा सैंतीस हजार भेदनि विषै संख्या, दोय प्रकार प्रस्तार, for प्रस्तारनि की अपेक्षा प्रक्षसंचार, नष्ट, समुद्दिष्ट पूर्वोक्त विधान तें यथासंभव करना । बहुरि गुढ यंत्र करने का विधान न कह्या, सो गूढ यंत्र कैसे होइ ? तातें इहां भाषा विषै गूढ यंत्र करने का विधान कहिए है । जाकों जानें, arer चाहिए, ताका गूढ यंत्र कर लीजिये । तहां पहिले प्रथम प्रस्तार की अपेक्षा कहिए है । जाका गुढ यंत्र करना होइ, तिस विवक्षित के जे मूलभेद जितने होंइ, तितनी पंक्ति का यंत्र करना । तहां तिन मूल भेदनि विषै अंत का मूलभेद होइ, की पंक्ति सबनिके ऊपर करनी। तहां तिस मूल भेद के जे उत्तर भेद होंहिं, तिने कोठे करने । तिन कोठानि विषै तिस मूल भेद्र के जे उत्तर भेद होंहिं, ते क्रम तें लिखने । बहुरि तिनही प्रथमादि कोठानि विषै एक, दोय इत्यादि क्रम तें एकएक बधता का अंक लिखना । बहुरि ताके नीचे जो अंत भेद तें पहला उपांत मूल भेद हो, ताकी पंक्ति करनी। तहां उपांत मूल भेद के जेते उत्तर भेद होइ तिनके htठे करने । तहाँ उपान्त मूल भेद के उत्तर भेदनि को क्रम तें लिखने । बहुरि तिनहीं कोठानि विषै प्रथम कोठा विषै बिंदी लिखनी। दूसरे कोठा विषे ऊपर की पंक्ति का अंत का कोठा विषै जेते का अंक होइ, सो लिखना । बहुरि तृतीयादि atorfir fat सरा कोठा विषै जेसे का अंक लिख्या, तितना-तितना ही बधाई बधाई क्रम तैं लिखने । बहुरि ताके नीचे-नीचे जे उपांत ते पूर्वे मूल भेद होंइ, ताक आदि देकर आदि के मूल भेद पर्यंत जे मूल भेद होंइ, तिनकी पंक्ति करनी। वहां तिनके जेते-जेते उत्तर भेद होंइ, तितने-तितने कोठे करने । बहुरि तिन कोठानि विषै अपनामूल भेद के के उत्तर भेद होंइ, ते क्रम तें लिखने ।
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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