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________________ १२० ] [ गोम्मटसार जीकाण्ड गाथा ४४ इगिfararasari, खसोलरागडुदालचउसठि । संविय पमपठाणे, द्दिट्ठ व जाण तिट्ठाणे ॥४४॥ एक द्वित्रिचतुः खचतुरष्टद्वादश खषोडशरागाष्टचत्वारिंशच्चतुःषष्टिम् । संस्थाप्य प्रमावस्थाने, नष्टोद्दिष्टे च जानीहि त्रिस्थाने ॥४४॥ टीका - प्रमादस्थानकनि विषै विकथा प्रमाद के व्यारि कोठानि विषै क्रम एक, दो, तीन, च्यारि अंकति कौं स्थापि; तैसे ही कषाय प्रमाद के व्यारि कोठानि विषै म तँ बिंदी, माठ, बारह अंकनि को स्थापि; तसे ही इंद्रिय प्रमादनि के पंच कोठानि विषै क्रम तें बिंदी, सोलह, बत्तीस, अड़तालीस, चौंसठ अंकनि क स्थापि, पूर्वोक्त प्रकार हेतु ते तिन तीनों स्थानकनि विष स्थापे जे अंक, तिनि विषै नष्ट र समुद्दिष्ट कौं तु जानहु । भावार्थ - यहां भी पूर्वोक्त प्रकार तीन पंक्ति का यन्त्र करना । तहां ऊपर की पंक्ति विषै च्यारि कोठे करने, तहां क्रम तं स्त्री यदि विकथा लिखनीं अर एक, दो, तीन, व्यारि, ए अंक लिखने । बहुरि ताके नीचे पंक्ति विषे च्यारि कोठे करने, तहां क्रम तैं क्रोधादि कषाय लिखने अर बिंदी, व्यारि, आऊ बारा ए अंक लिखने । बहुरि नीचे पंक्ति विष पांच कोठे करते, तहां क्रम से स्पर्शनादि इंद्रिय लिखने, अर बिंदी, सोलह, बसोस, ग्रड़तालीस, चौसठि ए अंक लिखने । करना ! स्त्री १ क्रोध ० स्पर्शन भक्त २. मान ४ रसना १६. राष्ट्र ३ | माया ८ | अवनि ४ लोभ १२ चक्षु ४८ ब्रारण ३२ श्रोत्र ६४ असे यंत्र करि पूर्व जैसे विधान कह्या, तेसे इहां भी नष्ट, समुद्दिष्ट का ज्ञान हो नष्ट का उदाहरण -- जैसे पंद्रहवां आलाप कैसा है ? सा प्रश्न होते विकथा, कषाय, इंद्रियति के जिस-जिस कोठा के अंक वा शून्य मिलाएं, सो पंद्रह संख्या होइ, तिस तिस कोठा को प्राप्त विकथादिक जोड़ें, राष्ट्रकथालापी- लोभी - स्पर्शन इंद्रिय के वशीभूत-निद्रालु स्नेहह्वान अंसा तिस पंद्रहवां श्रालाप को कहै । .
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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