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________________ सम्यग्ज्ञानचन्द्रिका भाषाटीका ] बहुरि स्वरूपविपर्यास क है हैं - रूपादिक गुण निर्विकल्प हैं, कोऊ कहै-हैं ही नाहीं । कोऊ कहै -- रूपादिकनि के जानने करि तिनके आकार परिणया झान ही है नाही, तिनका अवलंबन बाह्य वस्तुरूप है । जैसा विचार स्वरूप विर्ष मिथ्यारूप जानना । या प्रकार कुमतिज्ञान का बल का श्राधार करि कुश्रुतज्ञान के विकल्प हो हैं । इनका सर्व मूल कारण मिथ्यात्व कर्म का उदय ही है, जैसा निश्चय करना। प्रागै सासादनगुणस्थान का स्वरूप दोय सूत्रनि करि कहै हैं - आदिमसम्मत्तद्धा, समयादो छावलित्ति वा सेसे । अरणअण्णदरुवयादो, रणासियसम्मोत्ति सासरपक्खो सो॥१६॥ आदिमसम्यक्त्वाद्वा, प्रासमयतः घडावलिरिति या शेषे । अनान्यतरोदयात् नाशितसम्यक्त्व इति सासानाख्यः सः ॥१९॥ . . टीका - प्रथमोपशम सम्यक्त्व का. काल. वि जघन्य एकसमय, उत्कृष्ट छह पावली अवशेष रहैं, अनंतानुबंधी च्यारि कषायनि विर्षे अन्यतम कोई एक का उदय होते संतै, नष्ट कीया है सम्यक्त्व जाने असा होई, सो सासादन जैसा कहिए । बहुरि या शब्दकरि द्वितीयोपशम सम्यक्त्व का काल विर्षे भी सासादन गुणस्थान की प्राप्ति हो है । औसा (गुणधराचार्यकृत) कषायप्राभूतनामा यतिवृषभाचार्यकृत (चूणिसूत्र) जयधवल ग्रन्थ का अभिप्राय है । जो मिथ्यात्व से चतुर्थादि गुणस्थाननि विर्षे उपशम सम्यक्त्व होइ, सो प्रथमोपशम सम्यक्त्व है। बहुरि उपशमश्रेणी चढते क्षायोपशमिक सम्यक्त्व हैं जो उपशम सम्यक्त्व होय, सो द्वितीयोपशम सम्यक्त्व जानना। सम्मत्तरयरणपव्ययसिहरादो मिच्छभूमिसमभिमुहो। वासियसम्मत्तो सो, सासरणरणामो मुरणेयन्वो ॥२०॥ सम्यक्त्यरत्नपर्वतशिखरात् मिथ्यात्वभूमिसमभिमुखः । माशितसम्यक्स्थः सः, सासननामा मंतव्य ॥२०॥ १. षट्खण्डायम .. यदला पुस्तक - १, पृष्ठ १६७, माथा १०८. . . .
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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