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________________ प्रस्तावना 17 और उसके गुणों तथा पर्यायों से संबंधित सभी विचार 'षट्खण्डागम' तथा आचार्य कुन्दकुन्द की रचनाओं के प्रधान में प्रकट किए हैं आवा कुव कहते हैं कि जो द्रव्य अपने गुणों से उत्पन्न होता है, वह उन गुणों से कभी भी भिन्न नहीं होता। जैसे कि लोक में स्वर्ण अपनी कड़ा आदि पर्यायों से भिन्न नहीं है, वैसे ही जीव अपने गुण- पर्यायों से भिन्न नहीं है। अतएव यह कथन सत्य नहीं है कि आचार्य अकलंकदेव ने 'तत्त्वार्थवार्तिक' में 'गुण पर्याय से भिन्न नहीं है" यह विचार सिद्धसेन से ग्रहण किया है। आगम ग्रन्थों में सभी बातों की चर्चा व्यवहार और निश्चय नय दोनों नयों की अपेक्षा से की गई है। यथार्थ में सम्पूर्ण दिगम्बर जैन- परम्परा इस विचार पर एक मत है और इसी प्रकार 'सन्मतिसूत्र' में चर्चित अन्य विचारों पर भी सहमत है। इतना ही नहीं, 'सन्मतिसूत्र' की व्याख्या को देखने से यह पता चलता है कि आ. सिद्धसेन के पूर्व एक मत अवग्रह को ही दर्शन मानता था। परन्तु आचार्य सिद्धसेन तथा आचार्य अकलंकदेव दोनों को ही यह मत मान्य नहीं था। अतएव दोनों ने इस मत की आलोचना की है। वास्तव में अवग्रह और दर्शन एक-दूसरे से भिन्न हैं। जैनागमों में स्पष्ट रूप से इनकी भिन्नता का उल्लेख मिलता है। आचार्य पूज्यपाद का कथन है कि इन्द्रिय और पदार्थ का योग होने पर सत्ता सामान्य का दर्शन होता है। आचार्य अकलंकदेव के अनुसार पदार्थ का निर्णय होने पर अनन्तर काल में सत्ता सामान्य का दर्शन ही अवग्रह है। विषय और विषयी के सम्बन्ध होने के अनन्तरकाल में जो प्रथम ग्रहण होता है उसे अवग्रह कहा जाता है। प्रो. कलघाटगी के शब्दों में "यथार्थ में यह इन्द्रियजन्य ज्ञान की अवस्था है I इसमें वस्तु के आकार का ज्ञान हुए बिना केवल उसके अस्तित्व का भाव होता है। चेतना में इन्द्रियों के द्वारा पदार्थ को ग्रहण करना यह आद्य विषय है; जैसा कि विलियम जेम्स ने कहा है ।" आचार्य कुन्दकुन्द और उमास्वामी के अतिरिक्त जिन आचार्य का प्रभाव विशेष 1. "तत्य जपाएण मडिगरियं दव्यं भावो होदि । एदस्त यट्टमाणकाली जणुक्करसेर्हि अंतोन्तो संखेोगतो अणाइणिरुणो श, अम्पिदपायपदमसम्प्पडुडि आचरिम-सम्बादो एसो बट्टमाणकालां तिणावादी । तेण भावकदीए दययणवविसयत्तं ण विरुझदं च सम्पइतेण सह विरोड़ों सुसुराणयविसयीकयपज्जा एगुलक्खियदव्यम्स सुत्ते भावतदवगमादो एवं वुत्तासेसत्यं मम्म काऊण णंगम-बबहार-संगहा लव्याओं कंटीओ इति भूइबलिभडारएण उत्तं।" - षट्खण्डागम, ग्रन्थ 9, नाखण्ड 4, 1, 48, पृ. 243 2. दवियं जं समज्जदि गुणेहिं जं तेहिं जागसु अणाल जह कडयादीहिंदु पज्जए कम समयसार, गा. 9 3. शास्त्री, पं. कैलाशचन्द्र जैन न्याय, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, 1966, पृ. 155 1. अक्षार्थयोगे सत्तालोकोऽर्थ्याकविकल्पथीः " लघीयस्त्रय कारिका 5 3. विषयविषयसन्निपातसमयानन्तरमाद्यग्रहणवग्रहः । विषयविनयसन्निपाते सति दर्शनं भवति तवनन्तरमर्थस्य ग्रहणमवग्रहः । सर्वार्थसिद्धि 1, 15 6. कलचाटगी, टी. जी. सम प्रोक्तेम्स इन मैन सायक्लॉजी, धारवाड़, 1961, पृ. ५७.
SR No.090409
Book TitleSammaisuttam
Original Sutra AuthorSiddhasen Divakarsuri
AuthorDevendra Kumar Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages131
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size2 MB
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