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________________ 1 श्री कवीश्वर गौतमस्वामिना विरचिता संबोह पंचासिया संबीह पंचासिया आयमंगल णमिऊण अरहचरणं वंदे पुण सिद्ध तिहुयणे सारं । आइरिय उवज्झाया साहू वंदामि तिविहेण ॥ | १ || अन्वयार्थ : : (अरहचरणं) अरिहन्तों के चरणों में (णमिऊण) नमस्कार करके (पुण) पुनः (तिहुणे) त्रैलोक्य में (सारं ) श्रेष्ठरूप (सिद्ध) सिद्धों को (वंदे ) नमस्कार करता हूँ (और) (तिविहेण) तीन प्रकार के परमेष्ठी (आइरिय) आचार्य (उवज्झाया ) उपाध्याय तथा (साहू) साधुओं को (वंदामि ) मैं नमस्कार करता हूँ । संस्कृत टीका : I अर्हतां चरणकमलं नमामि कथम्भूतानामर्हताम् ? षट्चत्वारिंशद्गुणै र्मण्डितानाम् । पुनः परमसिद्धानां गुणान्नमामि । किंविशिष्टानाम् ? अष्टगुण विराजमानानाम् । पुनः किंविशिष्टानाम् ? त्रिभुवनेषु त्रैलोक्येषु, सारं सारीभूतानाम् । पुनः निरञ्जन कर्मकलङ्करहितानाम् । पुनः त्रिविध निर्ग्रन्थानां गुरूणां प्रणमामि । कीदृशाः त्रिविधनिर्ग्रन्थाः ? षट्त्रिंशद्गुणैर्मण्डिता आचार्याः, पुनः पञ्चविंशति गुणैर्मण्डिता उपाध्यायाः पुनरष्टाविंशति गुणैर्मण्डिताः साधवः । कस्मै नमामि ? मोक्षाय । - टीकार्थ : मैं अरिहन्त परमेष्ठी के चरणकमलों में नमस्कार करता हूँ। कैसे हैं वे अरिहन्त परमेष्ठी ? वे छियालीस गुणों से मण्डित हैं। फिर मैं परम सिद्धों के 01
SR No.090408
Book TitleSamboha Panchasiya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGautam Kavi
PublisherBharatkumar Indarchand Papdiwal
Publication Year2003
Total Pages98
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size2 MB
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