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________________ JNI. २० रत्नमाला A7. - २०० रत्नमाला पष्ठ ना. - 50 || उपलब्ध हो जाये। कहीं इन्द्रिय-सुख प्रवृत्ति न बढ़े, राग न बढ़े आदि उद्देश्यों से यद्यपि || मुनिगण यावकों से (असंमियों से दूर ही रहते हैं, परन्तु साधना के लिए क्वचित् उन से सम्बन्ध भी रखते हैं। आ. कुन्दकुन्द लिखते हैं कि - वेज्जावच्चणिमित्तं गिलाण गुरुबाल वुट्टसमणाणं। लोमिगजणसंभासा ण णिविदो वा सुहोवजुदा ।। (प्रवचनसार - २५३) अर्थ : रोगी, गुरु, बाल तथा वृद्ध श्रमणों की सेवा के निमित्त से शुभोपयोगयुक्त मुनि का लौकिक जनों के साथ बातचीत करने का निषेध नहीं है। पहले समय में और वर्तमान समय में संहनन में अन्तर है। पहले संहनन मजबूत था, अनेकों उपवास करना, - परिषहों को सहन करना, उन के लिए जितना संभव था, जो आज हीन संहनन के कारण उतना संभव नहीं है। यद्यपि आज के मुनि भी भूतकालीन || मुनियों के समान ही निर्ममत्ववान हैं - परन्तु संहनन की मर्यादा है। ___ ऐसा नहीं है कि पहले सम्पूर्ण मुनिगण वनों में ही रहते हो। श्रावकों के यहाँ अथवा |जिनालयों में भी वे रहते थे तथा राजा के उद्यान में भी उनका रहना होता था। यथा - १. राजा ने सेठ और ग्वाला के साथ सहस्त्र कूट जिनालय में जाकर जिन भगवान की वंदना की और तत्पश्चात् सुगुप्त मुनि की वंदना की पुण्याश्रव कथाकोश पूजाफल - २. मणिमाली मुनि ने जिनदत्त सेठ के घर पर (उज्जयिनी नगरी में) चातुर्मास किया। ||(पुण्याभव कथा कोश - पूजाफल - ८) ३. सुकुमार के मामा यशोभद्र मुनिराज ने भवन के निकटवर्ती उद्यान में स्थित जिन भवन में चातुर्मास किया। (पुण्याअव कथाकोश-शुतोपयोग फल • ४/५) ___ मुनिगण विविक्त वसतिका में रहते हैं। वह विविक्त वसतिका कौनसी है? इसका उत्तर देते हुए आ. शिवकोटि लिखते है कि - जत्थ ण सोत्तिग अत्थि दु सहरसरूवगंध फासेहिं | सज्झायज्झाणबाधादो वा वसधी विवित्ता सा।। अर्थ : जा वसतिका में शब्द, रस, रूप, गन्ध, स्पर्शकरि अशुभ परिणाम नाहीं होय || तथा स्वाध्याय का अर शुभध्यान का धात नहीं होय. सो विविक्त वसतिका है। आगे वे लिखते हैं कि सुण्णघर गिरिगुहा रुक्खमूल आगन्तुगारदेवकुले। अकदप्पभारारामघरादीणि य विचित्ताई || (भगवती आराधना २३६) ! न सुविधि ज्ञान चन्द्रिका प्रकाशन संस्था, औरंगाबाद. Mon - - - - - - - - - - - - - -- BAV --
SR No.090399
Book TitleRatnamala
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
AuthorSuvidhimati Mata, Suyogmati Mata
PublisherBharatkumar Indarchand Papdiwal
Publication Year
Total Pages144
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size3 MB
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