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________________ हुई हैं। संकटग्रस्त मानवमात्र को मनियां बन्धुजन की भाति उनित मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं। शाब्दिक रष्टि से सुन्दरतापूर्वक कही गयी उक्ति के अर्थ में सूक्ति का प्रयोग होता है । संस्कृत वाहमय में सूक्ति का प्रयोग एक विशेष पर्थ में किया जाता है। मूक्ति वह पदरचना है जो स्वयं में परिपूर्ण हो मोर नसिक, चारित्रिक, धार्मिक अथवा रागारमक किसी एक विचार को प्रस्तुत करने में समर्थ हो। इस प्रकार वाक्पटुता के साथ कही गयी मुक्तक से साम्य रखने वाली रचना को मूक्ति कहा जाता है । मद्यपि मूक्ति और सुभाषित दोनों ही मुक्तककाव्य में परिगणित हैं किन्तु प्रयन्धकाव्य की तरह दोनों के लिए किसी पूर्वापर सम्बन्ध की प्रावश्यकता नहीं होती । जैसा पहले कहा गया है, वे अपने आप में पूर्ण एवं स्वतन्त्र होती हैं । दोनों उद्देश्य में भी समान ही हैं । इनमें अन्तर केवल इतना ही है कि सुभाषित विस्तार की दृष्टि से पूरे पक्ष में रहता है जबकि सक्ति श्लोकार्ष अथवा फ्लोक के एक चरण में होती है । मस्तियां प्रायः दो कारणों से प्रत्यधिक प्रिय एवं अभिरुचि का विषय रही हैं । एक तो ये दुलहता से मुक्त होती हैं। इनकी समझने में कठिन श्रम एवं साधना की अधिक अपेक्षा नहीं रहती, दूसरे ये सरलता मे कण्ठस्थ हो जाती हैं तथा समुचित अवसर पर आवश्यकः प्रभात्र उत्पन्न करने के लिए इनका प्रयोग होता रहता है। आधार एवं व्यवहार सम्बन्धी इन सूक्तियों के महत्त्व को जितना प्रतिपादित किया जाय उतना कम होगा। मनीषियों ने अपनी अगाध अन्तचेतना एवं मनन के द्वारा समाज के लिए मुक्ति-धारा प्रवाहित करने का प्रत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य किया है । जीवन के सराम और वीतराम इन दोनों पक्षों की पोर उनकी दृष्टि रही है। दोनों ही पक्षों से सम्बन्धित मुक्तियों का अभिप्रेत समाज का उन्नयन रहा है। अंगसाहित्य में सूक्तितत्व पूर्णरूप से विकसित हुँधा है । इसके विकाम-क्रम पर दृष्टिपात करने से इसका स्वरूप स्पष्ट हो आता है। विकास की प्रथम अवस्था है निर्देश । इसमें किसी व्यक्ति विशेष को लक्ष्य करके उपवेश दिया जाता है । यह उपदेश भतिक, धामिक मादि किसी भी विषय का हो सकता है। विकास के दूसरे चरण में सक्ति व्यक्ति से उठकर समष्टि तक पहुंच जाती है। अध यह केवल व्यक्तिपरक न रहकर समाज में फैल जाती है। सूक्तियों में निस्सार का प्रभाव होता है, पर उनको संक्षिरित महज ही तीव्रता में परिणत हो जाती है। यह तीयता मानव को कर्मठ बनाने में-सही मार्ग पर चलने में सहायक होती है।
SR No.090386
Book TitlePuran Sukti kosha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanchandra Khinduka, Pravinchandra Jain, Bhanvarlal Polyaka, Priti Jain
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year
Total Pages129
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationDictionary & Literature
File Size2 MB
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