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________________ ४ सहजानन्दशास्त्रमालायां जन्यां परमार्थसत्यां मोक्षलक्ष्मीमक्षयामुपादेयत्वेन निश्चिन्वन् प्रवर्तमानतीर्थनायकपुरःसरान् भगवतः पंचपरमेष्ठिनः प्रणमनवन्दनोपजनितनमस्करणेन संभाव्य सर्वारम्भेण मोक्षमार्ग संप्रतिपद्यमानः प्रतिजानीते--- प्राप्त करके समस्त पक्षपरिग्रहसे मुक्त हो जानेसे प्रत्यन्त मध्यस्थ होकर सर्व पुरुषार्थों में सारपना होनेसे आत्मा के लिये प्रत्यन्त उत्कृष्ट हिततम, भगवान पञ्च परमेष्ठोके प्रसादसे उपजन्य परमार्थसत्य अविनाशी मोक्षलक्ष्मीको उपादेयरूपसे निश्चित करता हुआ प्रवर्तमान तीर्थके नायक श्री महावीर स्वामी पूर्वक भगवंत पंच परमेष्ठियोंको प्रणमन वन्दनसे होने वाले नमस्कार के द्वारा विनय करके सर्व उद्यमसे मोक्षमार्गको प्राप्त होता हुआ प्रतिज्ञा करता है । भावार्थ - श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेव वर्तमानधर्मतीर्थनायक महावीर भगवानको प्रणाम कर शेष समस्त तीर्थंकर व पञ्च परमेष्ठियों को प्रणाम कर सर्व उद्यमसे अपना लक्ष्य प्रकट करेंगे । तथ्यप्रकाश - ( १ ) जिसका संसारसागर से पार होना निकट है वही मोक्षमार्गको प्राप्त होता है । (२) जिसके सातिशय विवेक ज्योति प्रकट हुई है वही अनेकान्तवादको विद्या को प्राप्त कर सकता है । ( ३ ) जिसके किसी भी एकान्तवादका प्राग्रह नहीं रहा वही पक्ष परिग्रह दूर कर निष्पक्ष हो सकता है । ( ४ ) मोक्षलक्ष्मी ही प्रात्माको हितरूप है । ( ५ ) समस्त पुरुषार्थों में सार मोक्षोद्यम है । सिद्धान्त -- ( १ ) मोक्षलक्ष्मी पञ्च परमेष्ठी के प्रसादसे उपजन्य है । (२) पञ्च परमेष्ठीका प्ररणमन वन्दनसे होने वाले नमस्कारसे विनय किया जाता है । दृष्टि - श्राश्रये श्राश्रयी उपचारक व्यवहार [ १५१ ] । प्रयोग - विवेकज्योति प्रकट करके एकान्तवादहठ छोड़कर पञ्च परमेष्ठीको उपासना से प्रत्माभिमुखताकी पात्रताके वातावरण में समतासंपादनका पौरुष करना । अब गाथासूत्रोंका अवतार होता है - [ एषः ] यह मैं [ सुरासुरमनुष्येन्द्रवंदितं ] सुरेन्द्रों, सुरेन्द्रों और नरेन्द्रोंसे वन्दित तथा [ धौतघातिकर्ममलं ] जिन्होंने घातिकर्ममलको धो डाला है, ऐसे [तीर्थं] तीर्थरूप और [ धर्मस्य कर्तारं ] धर्मके कर्ता [ वर्धमानं ] श्री वर्द्धमान स्वामीको [प्रणमामि] नमस्कार करता हूँ। [ पुनः] और [ विशुद्धसद्भावान् ] विशुद्ध सत्तावाले [ससर्वसिद्धान्] सर्वं सिद्धभगवन्तों सहित [शेषान् तीर्थंकरान् ] शेष तीर्थंकरोंको [च] और [ ज्ञानदर्शनचारित्रतपोवीर्याचारान् ] ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार तथा वीर्याचार युक्त [श्रमरणान् ] श्रमरणोंको नमस्कार करता हूं । [ तान् तान् सर्वान् ] उन उन सबको [च] तथा [भानुषेक्षेत्रे वर्तमानान् ] मनुष्य क्षेत्र में विद्यमान [ श्रर्हतः ] ग्ररहन्तोंको [ समकं समकं ] साथ ही साथ याने समुदायरूपसे और [ प्रत्येकं एव प्रत्येकं ] प्रत्येक प्रत्येकको याने व्यक्तिगत [ वन्दे ]
SR No.090384
Book TitlePravachansara Saptadashangi Tika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size22 MB
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