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________________ पूज्यपादश्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यप्रणीतः प्रवचनसारः १. ज्ञानतत्न-प्रज्ञापनम् श्रीमवमृतचन्द्रसूरिकृततत्वप्रदीपिकावृत्तिः Houseumakalinsanilimmisthurimaithun (मङ्गलाचरम्) सर्वव्याप्येकचिद्र पस्वरूपाय परात्मने। स्वोपलब्धिप्रसिद्धाय ज्ञानानन्दात्मने नमः ॥ १ ॥ हेलोल्लुप्तमहामोहतमस्तोमं जयत्यदः । प्रकाशयञ्जगत्तत्त्वमनेकान्तमयं महः ॥ २ ॥ परमानन्दसुधारसपिपासितानां हिताय भव्यानाम् । क्रियते प्रकटिततत्त्वा प्रवचनसारस्य वृत्तिरियम् ॥ ३ ॥ अध्यात्मयोगी न्यायतीर्थ पूज्य श्री गुरुवर्य श्रीमत्सहजानन्दकृत सप्तदशाङ्गी टीका सर्वव्याप्येक इत्यादि...- अर्थ--सर्वव्यापी एक चित्स्वरूपमय, स्वोपलब्धिसे प्रसिद्ध ज्ञानानंदात्मक उत्कृष्ट प्रात्माको नमस्कार हो । भावार्थ---यहाँ प्रात्माके सहजस्वरूपको नमस्कार किया गया है, क्योंकि इसी सहज स्वरूपके आश्रयसे मोक्षमार्ग में प्रगति कर मोक्ष प्राप्त किया जाता है एवं स्वरूपके अनुरूप विकास होता, अतः इन्हीं विशेषणों द्वारा सर्वज्ञ वीतराग परमात्माको नमस्कार किया गया है । प्रसंगविवरण-प्रवचनसार ग्रन्थ राजकी तत्त्वप्रदीपिका टीका करते समय श्री अमृत
SR No.090384
Book TitlePravachansara Saptadashangi Tika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size22 MB
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