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________________ शुद्धि पृष्ठ । १८ ) शुद्धि-अशुद्धि-पत्र पंक्ति अशुद्धि करती हुई लक्षणभून खुखका दहकी पंक्ति १८ पृष्ठ १०१ १०८ अशुद्धि कृतज्ञाता हुवाते विशुद्धि अबिकार प्रन्य प्वतंत्रपना आर इन्द्रियग्राम आत्मके द्वारा व्वापकर कृतज्ञता बताते विशुद्ध अविकार अन्य स्वतंत्रपना और इन्द्रियज्ञान आत्माके शुद्धि करता हुवा लक्षणभूत सुखका देहकी मिट न जौंक जाने से मिट गौंच ० ०PY FM छाने १४० १४१ क्षीयमान निष्क्रिय अकम्परूप से व्यापकर १४१ १४१ १४२ १५१ १५२ आदत आद्रत and होता १६४ होता होती होती त्रिकाल क्षीयमाण निष्क्रिय अवम्परूप से परिणाम उयपदविवरण सभ्यास था चंद्र जिसमें ध्यय अनस्थित होना उसा ग्राह पयायाथिक विध अब १७० १७५ १६७ २०२ २०५ 800008050000000000000000000300 उभयदविवरण अभ्यास गाथा चंद्रा जिसने व्यय अवस्थित होता उसी ग्राह्य पर्यायार्थिक विरोध हवे छेदात् तिकाल अग जानना पति सप्रवेश समत करम्बित दिकल्प प्रबुद्धि केधली वियोगज जानता अति सप्रदेश समस्त 5 00000 २१६ २१६ २१७ विकल्प अबुद्धि केवली वियोग चेदात् २४२ २४८ २५२ २५२ धम धर्म २५३ कारकरम्बित पर्या वर्ण पर्याय गमन गगन ६७ ६७ २५३ २५६ २५७ २६२ था या बाली वाला ૧૦૧ २६ पुप्गल पुद्गल
SR No.090384
Book TitlePravachansara Saptadashangi Tika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size22 MB
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