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________________ ५० प्रमाणमीमांसा १०१ - हाच यद्यपि चेष्टोच्यते तथापि चेतनस्य सेति ज्ञानरूपैवेति युक्तं प्रत्यक्षभेदत्वमस्याः । न चानिर्णयरूपत्वादप्रमाणत्वमस्याः शङ्कनीयम्; स्वविषयनिर्णयरूपत्वात्, निर्णयान्तरासादृश्ये निर्णयान्तराणामप्य निर्णयत्वप्रसङ्गः ॥ २७॥ विशेषनिर्णयोऽवायः ॥ २८ ॥ १०२ - ईहाक्रोडीकृते वस्तुनि विशेषस्य 'शाङ्ख एवायं शब्दो न शार्ङ्गः' इत्येवंरूपस्यावधारणम् 'अवायः ॥ २८ ॥ स्मृतिहेतुर्द्धरणा ॥ २९॥ १०३ - 'स्मृतेः' अतीतानुसन्धानरूपाया 'हेतुः' परिणामिकारणम्, संस्कार इति यावत्, सङ्ख्येयमसङ्ख्येयं वा कालं ज्ञानस्यावस्थानं 'धारणा' । अवग्रहादयस्तु त्रय आहूत्तिकाः । १०४–संस्कारस्य च प्रत्यक्षभेदरूपत्वात् ज्ञानत्वमुन्नेयम्, न पुनर्यथाहुः परे - "ज्ञानादतिरिक्तो भावनाख्योऽयं संस्कारः" इति । अस्य ह्यज्ञानरूपत्वे ज्ञानरूपस्मृतिजनकत्वं न स्यात्, नहि सत्ता सत्तान्तरमनुविशति । अज्ञानरूपत्वे चास्यात्मधर्मत्वं न स्यात्, चेतनधर्मस्याचेतनत्वाभावात् । समान बन जाता है । ईहा सिर्फ वर्तमानकालीन पदार्थ को जानती है और वह प्रत्यक्षका मेद है । किन्तु ऊह परोक्ष का भेद है । अतएव इसमें पुनरुक्ति दोष नहीं है । १०१ - ईहा यद्यपि चेष्टा है । तथापि वह चेतन की चेष्टा है, अतः वह ज्ञानरूप ही है । उसे प्रत्यक्ष का भेद कहना उचित ही है, शंका - ईहा निर्णय ( निश्चय ) रूप नहीं होने से प्रमाण नहीं है? समाधान अपने विषय में तो वह निर्णयरूप ही है । दूसरे समी निर्णय के समान न होने से यदि उसे अनिर्णय कहा जाय तो सभी निर्णय अनिर्णय कहलाने लगेंगे ॥२७॥ अवाय का स्वरूप अर्थ - ईहा के द्वारा जाने हुए पदार्थ के विशेष अर्थ के निश्चय को अवाय कहते हैं ॥ २८ ॥ १०२ - ईहा के द्वारा जो वस्तु जानी गई थी, उसमें 'यह शब्द शंख का ही है, शृंगका नहीं' इस प्रकार का निश्चय हो जाना 'अवाय' कहलाता है॥ २८ ॥ धारणा का स्वरूप अर्थ--जो ज्ञान स्मृति का कारण हो, वह धारणा है | २९ ॥ १०३ - स्मृति अतीत का अनुसंधान करने वाली होती है। उसका जो परिणामी कारण हो वह धारणा है। इसे 'संस्कार भी कहते हैं। धारणा संख्यात या असंख्यात काल तक बनी रहती है । अवग्रह, ईहा और अवाय ज्ञान अन्तर्मुहूर्त भावी ही होते हैं । १०४--संस्कार प्रत्यक्ष का भेद है, अतएव ज्ञानस्वरूप ही है। वैशेषिकों की मान्यता है कि भावनानामक संस्कार ज्ञान से अतिरिक्त है, यह ठीक नहीं । यदि संस्कार को अज्ञानरूपमान लें तो वह आत्मा का अर्थ नहीं हो सकेगा । चेतन का अर्थ अचेतन नहीं हो सकता ।
SR No.090371
Book TitlePraman Mimansa
Original Sutra AuthorHemchandracharya
AuthorShobhachad Bharilla
PublisherTilokratna Sthanakvasi Jain Dharmik Pariksha Board
Publication Year1970
Total Pages180
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size18 MB
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