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________________ १२० प्रमाणमीमांसा २८-'दृष्टान्तः उक्तलक्षणस्तत्प्रतिपादकं 'वचनम्' 'उदाहरणम्' तदपि द्विविधं दृष्टान्तभेदात् । साधनधर्मप्रयुक्तसाध्यधर्मयोगी साधर्म्यदृष्टान्तस्तस्य वचनं साधर्योदाहरणम्, यथा यो धूमवान् सोऽग्निमान् यथा महानसप्रदेशः । साध्यधर्मनिवृत्तिप्रयुक्तसाधनधर्मनिवृत्तियोगी वैधर्म्यदृष्टान्तस्तस्य वचनं वैधर्योदाहरणम्,यथा योऽग्निनिवृत्तिमान् स धूमनिवृत्तिमान् यथा जलाशयप्रदेश इति ॥१३॥ २९-उपनयलक्षणमाह धर्मिणि साधनस्योपसंहार उपनयः॥१४॥ ३०-दृष्टान्तर्धामणि विसृतस्य साधनधर्मस्य साध्यमिणि यः 'उपसंहारः' सः 'उपनयः' उपसंह्नियतेऽनेनोपनीयतेऽनेनेति वचनरूपः, यथा धूमवांश्चायमिति ॥१४॥ ३१-निगमनं लक्षयति साध्यम्य निगमनम् ॥१५॥ ३२-साध्यधर्मस्य मिण्युपसंहारो निगम्यते पूर्वेषामवयवानामर्थोऽनेनेति 'निगमनम', यथा तस्मादग्निमानिति । ____३३-एते नान्तरीयकत्वप्रतिपादका वाक्यैकदेशरूपाः पञ्चावयवाः । एतेषामेव २८-दृष्टान्त का स्वरूप पहले कहा जा चुका है। उसका प्रतिपादक वचन उदाहरण कहलाता है । दृष्टान्त के दो भेद होने से उदाहरण के भी दो भेद हैं। साधनधर्म के होने के कारण जो साध्यधर्मवाला हो, वह साधर्म्यदृष्टान्त कहा गया है और उसका प्रतिपादक वचन साधर्योदा. हरण है। जैसे-जो जोधूमवान् होता है वह वह अग्निमान होता है,जैसे पाकशाला।साध्य के अभाव के कारण जहाँ साधन का अभाव हो, वह वधर्म्यदृष्टान्त कहा जा चका है। उसका प्रतिपादक वचन वैधोदाहरण है । जैसे जहाँ अग्नि नहीं होती वहाँ धूम भी नहीं होता। जैसे जलाशय-- तालाब वगैरह ॥१३॥ २९-उपनय का स्वरूप-सूत्रार्थ--पक्ष में साधन को दोहराना उपनय है ।१४॥ ३०-सपक्ष में फैले हुए साधन का पक्ष में उपसंहार करना उपनय कहलाता है। जिस वचन के द्वारा उपसंहरण या उपनयन-प्रापण किया जाय वह उपसंहार या उपनय है । अर्थात् व्याप्ति बोलने के पश्चात् पक्ष में हेतु को दोहराना उपनय है। जैसे 'पर्वत भी धूमवान् है ॥१४॥ ३१-निगमन का लक्षण--सूत्रार्थ-साध्य का पक्ष में दोहराना निगमन है। ३२-पहले बोले हुए समस्त अवयवों का प्रयोजन जिससे निगमित-निश्चित होता है उसे निगमन समझना चाहिए। जैसे 'इस कारण अग्निमान् है। ३३-परार्थानुमान के यह पाँच अवयव हैं,जो अविनाभाव के प्रतिपादक हैं। (१)-पर्वत में अग्नि है (प्रतिज्ञा) (२) क्योंकि पर्वत में धूम है (हेतु) (३) (जहाँ धूम होता है वहाँ अग्नि होती है, (व्याप्ति) जैसे पाकशाला (उदाहरण) (४) इस पर्वत में भी धूम है (उपनय) (५) इस कारण पर्वत में अग्नि है (निगमन)
SR No.090371
Book TitlePraman Mimansa
Original Sutra AuthorHemchandracharya
AuthorShobhachad Bharilla
PublisherTilokratna Sthanakvasi Jain Dharmik Pariksha Board
Publication Year1970
Total Pages180
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size18 MB
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