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________________ ५२ ने भाषापणानां विषयानुक्रमणिकां । दार्शनिकों के मतभेद का दिग्दर्शन २६ भिन्न-भिन्न दार्शनिकों के द्वारा भिन्नमित्र प्रमाण को ज्येष्ठ मानने की परंपराओं का वर्णन पृ० पं० २३ २४ २४ १३ ३० सूत्र १. १. ११ की आधारभूत कारिका की सूचना और उसकी व्याख्या की न्यायातार वृत्ति के साथ तुलना ३१ अभावप्रमाणवाद के पक्षकार और प्रतिपक्षियों का निर्देश | सूत्र १,१.१२ की व्याख्या की न्यायावतार वृत्ति के साथ तुलना ३२ प्रत्यक्ष के स्वरूप के विषय में भिन्न २ परंपराओं का वर्णन ३३ सर्वशवाद और धर्मवाद का ऐतिafe से reलोकन | सर्वेश के 1 विषय में दार्शनिकों के मतों का दिग्दर्शन | सर्वज्ञ और धर्मज्ञ की चर्चा # atter और बौद्धों के द्वारा दी nation rotat का वर्णन ३४ पुनर्जन्म और मोक्ष माननेवाले दार्शनिकों के सामने आनेवाले समान प्रश्नों का तथा उनके समान मन्तव्यो का परिगणन २५. ३ २६ १ २६ ११ २७ १२ ३४ १० ३५ समानभाव से सभी दार्शनिकों में पाये जानेवाले प्रिदायिक रोग का निदर्शन ३६ १६ २६ सूत्र १. १. १० को ठीक २ समने ३७ १ ३७ के लिये ग्रह देखने की सूचना १६ २० २७ वक्तृत्व आदि तुओं की educa fores terrear को प्रगट करनेवाले आचायों का निर्देश मनज्ञान के विषय में दो परंपराओं के स्वरूप संबंधी मतभेद का वर्णन इन्द्रिय पद की निरुक्ति, इन्द्रियों का कारण, उनकी संख्या, उनके विषय, उनके आकार, उनका पारस्परिक भेदाभेद, उनके प्रकार तथा उनके arit referय निरूपण विषयक दार्शनिकों के मन्तव्यों का तुलनात्मक दिग्दर्शन ४० मनके रूप, कारण, कार्य, धर्म और ३८ २१ नं० पृख पं० ४४ १२ ४४ २६ स्थान आदि अनेक विषयों में दार्शिनिकों के मतभेदों का संक्षिप्त वर्णन ४२ १४ ४१ आचार्यति चार प्रत्ययों के मूल स्थान का निर्देश ४३ २८५ ४२ अर्थोककारणतावाद नैयायिक बौद्ध उभय मान्य होने पर भी उसे बौद्ध सम्मत ही समज कर जैनान्वायों ने जो खण्डन किया है उसका खुलासा ४२ तदुतिताकारता का सिद्धान्त सौत्रान्तिकसम्म होने की तथा योगाचार बौद्धों के द्वारा उसके खण्डन की सूचना ४४ ज्ञानोपत्ति के क्रम का दार्शनिकों के द्वारा free free रूप से किये गए वर्णन का तुलनात्मक निरूपण ४५ अध्यवसाय, मानसज्ञान और अवग्रह के परस्पर भिन्न होने की आचार्यकृत सूचना का निर्देश | प्रतिसंख्या निरोध का स्वरूप ४६ अवाप और अपाय शब्द के प्रयोग की भिन्न २ परंपरा का और अकलंक कृत समन्वय का वर्णन ४७ धारणा के अर्थ के विषय में जैनाचार्यो के मतभेदों का ऐतिहासिक दृष्टि से वर्णन ४५ १६ ४६ ६ ४७ ५. ४] हेमचन्द्र ने मतानुसार प्रत्यक्ष का लक्षण स्थिर करके परपरिकल्पित लक्षणों का निरास करने में जिस प्रथा का अनुकरण किया है उसके इतिहास पर दृष्टिपात ४६. अक्षपादीय प्रत्यचसूत्र की वाचस्पति की व्याख्या पर 'पूर्वाचार्य कृतव्याख्यामुख्येन ' इस शब्द से आचार्य ने जो आक्षेप किया है और जो असंगत दिखता है उसकी संगति दिखाने का प्रयत्न ५० इन्द्रियों के प्राप्याप्राप्यकारिरुष के विषय में दार्शनिकों के मतभेदों की सूची ५१ प्रत्यक्षलक्षण विषयक दो बौद्ध परंप राओं का निर्देश और उन दोनों के aat के निरास करने वाले कुछ ४६ १४ ४८ १४ ४६ ७ ४६ २३
SR No.090370
Book TitlePramanmimansa
Original Sutra AuthorHemchandracharya
AuthorSukhlal Sanghavi, Mahendrakumar Shastri, Dalsukh Malvania
PublisherSaraswati Pustak Bhandar Ahmedabad
Publication Year1989
Total Pages182
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size6 MB
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