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________________ कथं पुनर्व्यवसायात्मकत्वे प्रत्यक्षस्याश्वं विकल्पयतो गोदर्शनं व्यवसायेन गां पश्यतस्तत्र तदन्यारोपस्यासंभवात्। निश्चयारोपमनसोर्बाध्यबाधकभावादिति चेन्न। तदा दर्शनेनाश्वसाधर्म्यस्यैव गवि व्यवसायात्तत्र चारोपस्यानुपपत्तेर्विशेषाकारे तस्यारोपो न च तस्य व्यवसायः ।कुतस्तर्हि तत्र तदारोप इति चेत् साधर्म्यनिर्णयादेव तस्य तदनुकूलतया प्रतीतेः। भवतस्तु दुःपरिहर एवायं पर्यनुयोगः ।।38 ।। - बौद्ध कहते हैं-प्रत्यक्ष के व्यवसायात्मक होने पर घोड़े का विकल्प करते हुए गोदर्शन कैसे होता है।व्यवसाय (निश्चय) से गाय को देखते हुए गाय में अश्व का आरोप असंभव होने से, निश्चय ज्ञान और आरोपित ज्ञान में बाध्य बाधक भाव होने से।यह कहना ठीक नहीं है।उस समय गाय को देखने से अश्व साधर्म्य का ही गाय में निश्चय होने से, वहां आरोप के नहीं होने से (विशेषाकार) खंडमुंडाकार में उसका आरोप है, उसका निर्णय नहीं है।किस कारण गाय में अश्व का आरोप है यदि यह कहो तो साधर्म्य का निर्णय होने से गाय के अश्व समान प्रतीत होने से।बौद्ध कहते हैं कि तुम्हारा यह कथन भी समीचीन नहीं है।।38 || मानसप्रत्यक्षेण नीलादिवत् क्षणक्षयादेरपि निर्णये कथं तत्राक्षणिकत्वाद्यारोपो यतस्तद्व्यवच्छेदार्थमनुमा नपरिकल्पनमिति।न च तस्य तेनानिर्णयो नीलादावपि तत्प्रसंगात् ।असकलप्रतिपत्तेरनभ्युपगमात् ।।39 ।। ___ मानस प्रत्यक्ष से नीलादि के समान स्वर्गप्राप्ति आदि का भी निर्णय होने पर वहां अक्षणिकत्व आदि का आरोप क्यों किया गया, जिससे उसका निराकरण करने के लिए "सर्व क्षणिकं सत्वात" इस अनमान की कल्पना की गयी?मानस प्रत्यक्ष से स्वर्गप्राप्ति आदि का अनिर्णय नहीं है नीलादि में भी उसका प्रसंग आने से, बौद्धों के यहां वस्तुको निरंश मानने से असकल प्रतिपत्ति नहीं मानी गयी है। 39 ।। न चास्माकं परामर्शभावेन प्रसितं, मनोव्यवसायस्य विनापि तेनाव्युत्पत्त्यादिविरोधरूपतयैवोपपत्तैः। अतद्रूपस्य तु न प्रामाण्यं अविसंवादवैकल्यात्। तथाहि ।यदविसंवादविकलं न तत्प्रमाणं, यथा अज्ञस्य विषदर्शनं, 'बौद्धो वदति। २ गवि अश्वोऽयमित्याद्यारोपस्य । ३ निश्चयज्ञानारोपज्ञानयोः । * गोरिति शेषः। खंडमुंडाकारे। 'बौद्धस्य मानसं प्रत्यक्ष व्यवसायात्मकमिति सौगतमतम्। 'स्वर्गप्रापणादि। " सर्व क्षणिकं सत्वादित्यादि। ' तस्मादृष्टस्य भावस्य दृष्ट एवाखिलो गुणः ।भ्रांतेर्निश्चयते नेति साधनं संप्रवर्तते।।इनि बौद्धैर्वस्तुनो निरंशत्वाम्युपगमात्। १० नित्यप्रसक्तं संबद्धमित्यर्थः । 23
SR No.090368
Book TitlePramana Nirnay
Original Sutra AuthorVadirajsuri
AuthorSurajmukhi Jain
PublisherAnekant Gyanmandir Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size14 MB
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