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________________ पीतज्ञानेन पीतज्ञानस्य तत्प्रसंगात् ।बाधोऽपि न स्वरूपापहार 'उत्पत्तिसमये तद्भावे तस्यानुत्पत्तिप्रसंगात्। अन्यदा च स्वयमेव नाशात। नापि विषयापहारस्तस्य नराधिपधर्मत्वेन ज्ञानेष्वसंभवात्। न च फलापहारः फलस्यापि विषयपरिच्छेदप्रवृत्त्यादेस्ततो दर्शनात्। न चापरो बाधप्रकार इति चेन्न, तद्विषयासत्त्वज्ञापन स्यैव बाधकत्वात्, तस्य च मरीचिकाप्रत्यये सति नेदं तोयं किंतु मरीचिका इत्याकारस्यावलोकनात्। कर्तव्यश्चैवमभ्युपगमोऽन्यथाबा धासत्त्व स्यापि अवबोध -नानुपपत्तेः, न समानविषयेणेत्यादिविचारस्य वैयोपनिपातात् ।तन्न विपर्ययस्य प्रामाण्यमसम्यक्वात्, एवमव्युत्पन्नसंशययोरपि तत्रापि यथातत्त्व – निर्णयस्य सम्यक्त्वस्याभावात्।।32 ।। इस प्रकार ज्ञान के स्वपर विषय वाला होने से मृगजल के ज्ञान को भी प्रमाणता का प्रसंग नहीं हो सकता।समीचीन ज्ञान में ही प्रमाणता मानी जाने से।मृगजल का ज्ञान सम्यक्त्व नहीं है, बाधा होने से प्रभाकर कहते हैं समान विषय के कारण बाधा है कि असमान विषय के कारण?समान विषय के कारण तो बाधा हो नहीं सकती उससे सम्यक्त्व की ही उत्पत्ति होने से।असमान विषय से नीलज्ञान से पीत ज्ञान होने के कारण पीतज्ञान को बाधा का प्रसंग आयेगा ।बाधा स्वरूपापहार नहीं हो सकता ।यदि स्वरूपापहार बाधा है तो वह उत्पत्ति के समय है कि अनुत्पत्ति के समय?उत्पत्ति के समय मानने पर उसकी उत्पत्ति ही नहीं होगी।अनुत्पत्ति के स्वयं का ही नाश हो जायेगा ।विषयापहार भी नहीं कह सकते निश्चय रूप से ज्ञान में उसके संभव नहीं होने से।फलापहार भी नहीं है विषयज्ञान की प्रवृत्ति आदि फल भी उसमें देखे जाने से अन्य कोई बाधा का प्रकार नहीं हैं।आचार्य कहते हैं ऐसा नहीं कह सकते, उसके विषय के न होने का ज्ञान ही बाधक होने से उसके मगजल होने का ज्ञान होने पर यह जल नहीं है किंतु मगजल है इस प्रकार का अवलोकन । से।यह मान लेना चाहिये अन्यथा बाधा के होने का भी ज्ञान नहीं हो सकेगा।"न समानविषयेण" इत्यादि विचार भी व्यर्थ हो जायेगे ।अतः विपर्यय ज्ञान प्रमाण नहीं है, असम्यक्त्व होने से।इसी प्रकार संशय और अनध्यवसाय में भी प्रमाणता नहीं है वहां भी तत्व का यथार्थ निर्णय करने वाले सम्यक्त्व का अभाव होने से।।32।। a ततस्तो यादावेव तत्प्रत्यस्य तद्भावः तस्य चाभ्यासदशायां स्वत एवावगमोऽन्यथा तु पद्मगन्धोदकाहरणादेलिंड्गविशेषात्। न चैवं लिड्गप्रत्ययसम्यक्त्वस्याप्यन्यतो लिड्गादवगमे ऽनवस्थानं दूरानुसरणेऽपि कस्यचिदभ्यस्तविषयस्य तत्प्रत्ययस्य संभवात्। ततः सुपरिज्ञानत्वात् ज्ञानेषु सम्यक्त्वस्यैवोपपन्नं, इदं सम्यग्ज्ञानमेव प्रमाणं अन्यथा तदनुपपत्तेरिति ।।33 ।। ' उत्पत्तिसमयेऽन्यदा वा। 'बाधकमंतरेण प्रथमज्ञानस्य। | निवेदनस्य। * प्रतियोगिभूतबाधज्ञानाभावे तदभावज्ञानानुपपत्तेः । अनध्यवसायः । न तु मरीचिकादौ तत्प्रत्ययस्य तगावः । 1 अनभ्यासदशायां।
SR No.090368
Book TitlePramana Nirnay
Original Sutra AuthorVadirajsuri
AuthorSurajmukhi Jain
PublisherAnekant Gyanmandir Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size14 MB
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