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________________ पहले के समान ही अनुवृत्तिजीवत्व स्वभाव का परित्याग नहीं होने से।यदि यह कहो कि पहले भी जीव के वास्तविक अनुवृत्तिः युक्तता नहीं है, अध्यारोप से ही उसके होने से तो अपर-अपर क्षणों में एकत्वाध्यवसायरूप अध्यारोप की प्रतिपत्ति नहीं होने से, अध्यारोप नहीं हो सकता, क्षणस्थायी की प्रतिपत्ति भी प्रत्यक्ष के समान अन्य किसी प्रमाण से नहीं होती, अपरापर समय युक्तता को वहां वास्तविक होने पर सत् वस्तु के रूप में ही जीव की व्यवस्थिति होने से, काल्पनिक होने पर उस कल्पना करनेवाले में भी इस प्रकार का प्रसंग होने पर अनवस्था दोष आयेगा ।अतः जीव का अनुवृत्तिमत्व वास्तविक ही है, कल्पना से अनुवृत्तित्व की उत्पत्ति नहीं होने से, अतः मोक्ष में नीरूपत्व सिद्ध होता है। 1142 ।। भवतु' तर्हि जीवस्तदानीं ब्रह्मवेदे ब्रह्मैव भवतीत्यामनात् ब्रह्मणैक्यमापन्न इति चेत् न, ब्रह्मणस्तदापि प्रागिव तद्भेदापरित्यागे तदनुपपत्तेः ।तत्परित्यागे चाताद वस्थ्येनानित्यत्वापत्त्या नित्यं ब्रह्मेति प्रतिज्ञाव्यापत्तेः प्रागपि तेनैक एव जीवः केवलमविद्यानिबंधन एव भेद इति चेत् न, तदभेदिनस्तस्य तद्वदेव सुविशुद्धज्ञानस्वभावतया तस्याप्यविद्यानुपपत्तेः भवतु को दोष इति चेत् न, तत्र नित्यनिर्मुक्ततया मुक्तयर्थस्यात्मदर्शनश्रवणमननादेराम्नायाभिरूढस्यानर्थक्या - पत्तेः । 1143।। विधिवादी कहते हैं जीव को मोक्ष होने पर उस समय वह "ब्रह्मवेदे ब्रहजैव भवति" इस आम्नाय के अनुसार वह ब्रह्या से ऐक्यपने को प्राप्त कर लेता है, यह कहना ठीक नहीं है, ब्रह्मा के उस समय भी पहले के समान उससे भेद को त्यागे बिना ब्रह्म की उपपत्ति नहीं होने से उसको त्यागने पर पूर्व अवस्था का त्याग होने पर अनित्यत्व की आपत्ति आने से "नित्यं ब्रह्या" इस प्रतिज्ञा का व्याघात हो जायगा ।उससे पहले भी एक एव जीव: केवलमविद्यानिबंधन एव भेद" इसके अनुसार एक ही जीव है, केवल अविद्या के कारण ही भेद दिखाई देता है, यह कहना भी ठीक नहीं है, ब्रह्मा से अभिन्न जीव के उसी के समान सुविशुद्ध ज्ञान स्वभावता के कारण उसके अविद्या की उपपत्ति नहीं हो सकती।ऐसा ही मान लो क्या दोष है?यह नहीं कह सकते।ऐसा मानने पर जीव के नित्य निर्मुक्तता हाने के कारण मोक्ष के लिये आम्नाय के अनुसार आत्म दर्शन, श्रवण, मनन आदि को अनर्थकता प्राप्त होने से।।143 ।। । अस्तु तर्हि जीवस्तदानीं निरवशेषबुद्धयादिवैशेषिकगुणनिर्मुक्त इति चेत् न, तस्य बुद्ध्यादिस्वभावत्वेन तदभावे सत्यभावस्यैव प्रसंगात् ।तद्रूपत्वं च तस्याऽहं बोद्धाऽहं द्रष्टेतिबुद्धयादिसमानाधिकरणतया प्रत्यवभासनादिति चेत, समानाधिकरणतया प्रत्यवभासनस्य च द्रव्यत्वं सामान्यमित्यादावभेदनिबंधनस्यैव प्रतिपत्तेः ।बुद्ध्यादेरात्मनस्तद्गुणत्वेन भेदान्मिथ्यैव तथा तत्प्रतिभासनमिति चेत्, कुतो भेदेऽपि स तस्यैव गुणो नाकाशादेरपि, समवायस्य तन्निबंधनस्य तत्रापि विधिवादी वक्ति। ' पूर्वावस्थाया अभावत्वेन। ३ यौगो वदति। 99
SR No.090368
Book TitlePramana Nirnay
Original Sutra AuthorVadirajsuri
AuthorSurajmukhi Jain
PublisherAnekant Gyanmandir Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size14 MB
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