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________________ न स्यात् तदविशेषात् ।माभूदिति चेत्, न तर्हि संशयादिरपि, तद्विकल्पस्यापि नानापरामर्शरूपत्वेनानेकांतात्मकत्वासंभवेऽनुपपत्तेः। भवतु सकृदनेकांतः, कथं तावता कमेणापि?विरोधाभावादिति चेत् न, निरन्वयविनाशे तस्य चिरातिकांतवत्कार्यतत्कालमप्राप्तस्यानुपयोगेनावस्तुत्वापत्तेः, सान्वयविनाशे तु स एव परापरसमयेष्वपि तस्य स्वभाव इति तदात्मनः कमानेकांतस्य ततः साधनमविनाभावस्य तत्रैवाध्यवसायात् ।।132|| इसी प्रकार परिणाम का -स्मरण प्रत्यभिज्ञान आदि से होने वाले उसके चेतन स्वभाव तथा अचेतन स्वभाव का भी कुंडल प्रसारण आदि से युक्त सर्पादि को अपने अनुभव से तथा इन्द्रियों से भी प्रत्यक्ष रूप से जाना जाने से ।इसी प्रकार अनुमान से भी अनुमान यह है-"कमादप्यन्नेकान्तात्मा युगपदप्यन्यथा तदनुपपत्तेः" कम से भी पदार्थ अनेकान्तात्मा है, अन्यथा युगपत् भी नहीं होने से संशयादि दोष के कारण पदार्थ के नित्य और अनित्य स्वभाव वाला नहीं होने से एक साथ नाना अथवा एकरूपत्व भी नहीं होगा, समानता होने सेन हो, यदि ऐसा कहते हो तो फिर संशय आदि भी नहीं होगें, ज्ञान के विकल्प को नाना परामर्श रूप से अनेकान्तात्मकत्व के नहीं होने पर नहीं होने से विपक्षी कहते हैं-युगपत् अनेकान्त मान लो कम से भी कैसे है?कमानेकान्त के अभाव में युगपत् अनेकान्त के सद्भाव का कोई विरोध नहीं होने से आचार्य कहते हैं-यह कहना ठीक नहीं है। चेतनादि का निरन्वय विनाश मानने पर चिर अतीत के समान कार्य के समय तत्काल न होने पर उपयोग नहीं होने से अवस्तुत्व का प्रसंग आने से ।सान्वय विनाश मानने पर तो पर और अपर समय में भी उसका वही स्वभाव होगा।अतः युगपत् अनेकान्तात्मकता कमानेकान्त का साधन है, अविनाभाव का वहीं निश्चय होने से।।132।। कस्तर्हि मार्ग इति चेत्, निःश्रेयसप्राप्त्युपाय एव। स च त्रिरूपः "सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग" इत्यागमात् । अनुमानाच्च। तत्रेदंत्रिरूपोऽपवर्गमार्गः अपवर्गमार्गत्वान्यथानुपपत्तेः। न चाऽत्र हेतोराश्रयासिद्धिरपवर्गवादिनां सर्वेषामपि तस्य प्रसिद्धत्वात् ।।133 || ___ मार्ग क्या है?यदि यह कहते हो तो मोक्ष की प्राप्ति का उपाय ही मार्ग है।वह त्रिरूप है-“सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्गः" इस प्रकार का आगम होने से।अनुमान से भी वह यह है "त्रिरूपोऽपवर्गः अपवर्गमार्गत्वान्यथा नुपपत्तेः" हेतु आश्रयासिद्ध भी नहीं है-सभी मोक्षवादियों के यहां मोक्ष के प्रसिद्ध होने से। 1133 ।। युगपदिति भावः । ज्ञानस्य। युगपत्। * अग्न्यभावे धूमसद्भावविरोधवत, कमानेकांताभावे युगपदनेकांतसद्भावस्य विरोधाभावात् । 5 चेतनादेः। अतीतवत्। 'आगमस्य प्रमाणांतराविरोधलक्षणं दर्शयति। 94
SR No.090368
Book TitlePramana Nirnay
Original Sutra AuthorVadirajsuri
AuthorSurajmukhi Jain
PublisherAnekant Gyanmandir Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size14 MB
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